(तस्वीर के साथ)
नयी दिल्ली, 11 मई (भाषा) प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव शक्तिकांत दास ने सोमवार को भारतीय उद्योग को मौजूदा वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में अपने कारोबार के रणनीतिक पुनर्संयोजन का सुझाव देते हुए कहा कि आपूर्ति के एक ही स्रोत पर निर्भरता घटाकर आपूर्ति शृंखला में विविधता लानी चाहिए।
दास ने यहां उद्योग मंडल भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के वार्षिक व्यापार सम्मेलन में कहा कि वैश्विक सुस्ती और भू-राजनीतिक तनाव के दौर में सीमित बाजारों या भौगोलिक क्षेत्रों पर अत्यधिक निर्भरता से खासकर निर्यातकों के लिए जोखिम बढ़ता है।
उन्होंने कहा, “बाजार में विविधता लाने से जोखिम का बंटवारा होगा, राजस्व स्थिर रहेगा और कंपनियों को वृद्धि के नए क्षेत्रों और मांग के अवसर मिलेंगे।”
दास ने कहा, “भू-आर्थिक विखंडन और आपूर्ति शृंखला में व्यवधान के इस दौर में भारतीय उद्योग के लिए अपने कारोबार का रणनीतिक पुनर्संयोजन करना जरूरी हो गया है, क्योंकि ‘कॉर्नर सॉल्यूशन’ मॉडल अब कम प्रभावी होता जा रहा है।”
‘कॉर्नर सॉल्यूशन’ का मतलब उत्पादन या आपूर्ति के लिए किसी एक ही स्रोत पर अत्यधिक निर्भर रहना है। इसमें आपूर्ति शृंखला का ‘जस्ट-इन-टाइम’ मॉडल भी शामिल होता है।
उन्होंने कहा कि मौजूदा संदर्भ में कॉरपोरेट जगत के लिए अपनी लागत न्यूनतम रखने के बजाय ‘जुझारूपन को अधिकतम करना’ अब प्राथमिकता बनती जा रही है, जो लंबी अवधि में अधिक लाभकारी साबित हो सकती है।
दास ने कहा कि सरकार ने मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों से निपटने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर, बुनियादी ढांचे पर बढ़ते पूंजीगत व्यय और विभिन्न देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) जैसे कई कदम उठाए हैं तथा सुधारों को लेकर कोई ढिलाई नहीं बरती जा रही है।
उन्होंने कहा कि भारत ने वैकल्पिक ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ाने की दिशा में लगातार प्रयास किए हैं, जिससे पश्चिम एशिया संकट से उत्पन्न ऊर्जा चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलेगी।
बुनियादी ढांचा निवेश पर उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय में उल्लेखनीय वृद्धि होने से देश में बड़ी-बड़ी अवसंरचना परियोजनाएं तेजी से पूरी हो रही हैं, जो वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत को एक सकारात्मक उदाहरण के रूप में पेश करती हैं।
दास ने घरेलू उद्योगों के लिए सात रणनीतियों का सुझाव दिया जिनमें संगठनात्मक मजबूती बढ़ाना, बही-खाते को मजबूत करना, नई आपूर्ति शृंखला विकसित करना, कौशल उन्नयन, नए बाजारों में विस्तार, भविष्य की तैयारी के लिए निवेश और शोध एवं विकास पर जोर शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि नीतिगत स्थिरता और समय पर सुधारों के जरिये भारत न केवल व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर एक प्रतिस्पर्धी और समावेशी अर्थव्यवस्था के रूप में भी उभरेगा।
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