नयी दिल्ली, छह मई (भाषा) भारत को वैश्विक व्यापार परिदृश्य में दोहरा नजरिया अपनाना चाहिए, जिसमें वह बहुपक्षीय प्रणाली के मूल सिद्धांतों को बनाए रखते हुए अपने हितों के अनुरूप चुनिंदा और रणनीतिक रूप से ‘चयनित बहुपक्षीय’ पहलों में भागीदारी करे। विशेषज्ञों ने यह सुझाव दिया है।
चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (सीआरएफ) और इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (इक्रियर) की तरफ से पांच मई को आयोजित एक संगोष्ठी में यह सुझाव सामने आया। संगोष्ठी का विषय ‘डब्ल्यूटीओ एमसी14 के नतीजे: बहुपक्षीयता का भविष्य और भारत के व्यापार एजेंडा पर प्रभाव’ था।
संगोष्ठी में शामिल वक्ताओं ने कहा कि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) आज भी प्रासंगिक है क्योंकि सदस्य देश इसके नियमों से लाभान्वित हो रहे हैं। हालांकि, बदलते वैश्विक परिदृश्य में बहुपक्षीय पहलें तेजी से महत्व हासिल कर रही हैं।
सीआरएफ के अध्यक्ष शिशिर प्रियदर्शी ने कहा, ‘भारत को अपनी विश्व व्यापार रणनीति में संतुलन लाने की जरूरत है। भारत को एक तरफ विकासशील देशों के हितों की रक्षा करने वाली डब्ल्यूटीओ की नियम-आधारित प्रणाली का समर्थन जारी रखना चाहिए, वहीं दूसरी तरफ अपने आर्थिक एवं रणनीतिक हितों से जुड़े क्षेत्रों में प्लूरिलेटरल यानी चयनित बहुपक्षीय वार्ताओं में शामिल होने पर भी विचार करना चाहिए।’
चयनित बहुपक्षीय (प्लूरिलैटरल) वार्ता में सभी नहीं, बल्कि कुछ इच्छुक देश मिलकर किसी खास क्षेत्र पर समझौता करते हैं। इसमें बाकी देशों का शामिल होना अनिवार्य नहीं होता है।
भारत अब तक डब्ल्यूटीओ में चल रही कई चयनित बहुपक्षीय वार्ताओं का हिस्सा नहीं बना है क्योंकि उसका मानना है कि इस तरह के समझौते बहुपक्षीय प्रणाली को कमजोर कर सकते हैं और विकासशील देशों को हाशिये पर डाल सकते हैं।
इक्रियर के निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी शेखर अय्यर ने कहा कि मार्च में याउंडे में आयोजित डब्ल्यूटीओ की 14वीं मंत्रिस्तरीय बैठक (एमसी14) ने बहुपक्षीय और चयनित बहुपक्षवाद के दृष्टिकोण के बीच विभाजन को उजागर किया।
डब्ल्यूटीओ में वर्तमान में निवेश सुविधा और ई-कॉमर्स जैसे क्षेत्रों में कुछ प्रमुख ‘प्लूरिलैटरल’ पहलें चल रही हैं, जिनमें सभी सदस्य देश शामिल नहीं हैं। भारत और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों ने इन पर चिंता जताई है कि ये सहमति-आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था को दरकिनार कर सकती हैं।
संगोष्ठी में यह भी रेखांकित किया गया कि बदलते भू-राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य के बीच बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करने के लिए व्यावहारिक और सहयोग-आधारित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है, जिससे एक खुली, नियम-आधारित और समावेशी वैश्विक व्यापार प्रणाली सुनिश्चित की जा सके।
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प्रेम रमण
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