नयी दिल्ली, 29 जनवरी (भाषा) संसद में बृहस्पतिवार को पेश की गई आर्थिक समीक्षा के अनुसार कृत्रिम मेधा (एआई) के क्षेत्र में भारत के देर से प्रवेश करने के अपने फायदे हैं, जिसे अब तक कम करके आंका गया है। इससे देश उन अधिक ऊर्जा आधारित और आर्थिक रूप से जोखिम भरे मॉडल से बच सकता है, जिन्हें शुरुआती देशों ने अपनाया है।
आर्थिक समीक्षा में कहा गया कि इसके बजाय, भारत अधिक संसाधन कुशल और समावेशी एआई मार्ग अपना सकता है, जो देश के सार्वजनिक उद्देश्यों के अनुरूप हो।
समीक्षा में ‘भारत में एआई पारिस्थितिकी तंत्र का विकास’ पर एक पूरा अध्याय दिया गया है। इस विषय पर इतना जोर दिया जाना ही इस बात का संकेत है कि भारत और उसके नीति निर्माताओं के लिए यह परिवर्तनकारी प्रौद्योगिकी कितनी महत्वपूर्ण है।
समीक्षा में स्पष्ट किया गया कि जवाबदेही और सुरक्षा के सवालों को टाला नहीं जा सकता। इसमें घोषणा की गई कि नियमन, डेटा शासन और सुरक्षा को एआई के इस्तेमाल के साथ ही विकसित करना होगा, न कि इसके लागू होने के बाद।
यह अध्याय इस बात की पड़ताल करता है कि एआई वैश्विक अर्थव्यवस्था को कैसे नया आकार दे रहा है। साथ ही, यह तेजी से प्रौद्योगिकी बदलाव और अनिश्चितता के बीच भारत के लिए एक व्यावहारिक रणनीति की रूपरेखा तैयार करता है।
दस्तावेज में कहा गया, ‘‘एआई को अपनाने में अपेक्षाकृत देर से आने आने के कारण भारत को एक अनूठा लाभ मिलता है। जिन देशों ने इसे शुरुआत में अपनाया, उन्होंने नियमन के अभाव और सस्ती पूंजी के दौर में एआई का विस्तार किया। वे अब ऐसी परिस्थितियों में फंस गए हैं, जिनसे पीछे हटना बहुत कठिन है। इसमें पर्यावरण के लिए हानिकारक ऊर्जा की भारी मांग वाली संरचना और स्पष्ट कमाई के बिना बढ़ते वित्तीय वादे शामिल हैं।’’ भारत के पास अब पिछले अनुभवों से सीखने का लाभ है।
समीक्षा के अनुसार, इसके चलते भारत एक ऐसी एआई प्रणाली तैयार कर सकता है, जो शुरू से ही अधिक संसाधन कुशल और सार्वजनिक उद्देश्यों के साथ जुड़ी हो।
भाषा पाण्डेय अजय
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