मेटा का सबसे उन्नत एआई इमेज जनरेटर ‘म्यूज इमेज’ पेश, दुरुपयोग की आशंका

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मेटा का सबसे उन्नत एआई इमेज जनरेटर 'म्यूज इमेज' पेश, दुरुपयोग की आशंका

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  • Publish Date - July 8, 2026 / 06:28 PM IST,
    Updated On - July 8, 2026 / 06:28 PM IST

नयी दिल्ली, आठ जुलाई (भाषा) प्रौद्योगिकी कंपनी मेटा ने अपने अब तक के सबसे उन्नत एआई इमेज जनरेटर ‘म्यूज इमेज’ को पेश करने की घोषणा की है लेकिन इस कदम को डेटा गोपनीयता, इमेज-स्क्रैपिंग और सहमति से जुड़े सवालों के बीच आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।

इमेज-स्क्रैपिंग का मतलब ऑनलाइन मंचों से तस्वीरों को उपयोगकर्ता की स्पष्ट अनुमति के बगैर स्वचालित रूप से इकट्ठा करने से है।

कंपनी ने कहा कि ‘म्यूज इमेज’ मेटा सुपरइंटेलिजेंस लैब्स द्वारा विकसित पहला मीडिया-जनरेशन मॉडल है, जो निर्देशों का सटीक पालन, मल्टी-रेफरेंस कम्पोजिशन और तस्वीर संपादन जैसी क्षमताएं प्रदान करता है।

मेटा ने कहा कि ‘म्यूज इमेज’ में ‘कंटेंट सील’ नामक एक अदृश्य वॉटरमार्किंग सिस्टम जोड़ा गया है, जिससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि कोई तस्वीर एआई से बनाई गई है या नहीं। कंपनी ऐसे डिटेक्शन टूल का भी परीक्षण कर रही है, जो इस वॉटरमार्क की पहचान कर सके।

यह सेवा फिलहाल मेटा एआई ऐप, मेटा.एआई और अमेरिका में इंस्टाग्राम स्टोरीज पर उपलब्ध है, जबकि कुछ देशों में सीमित तौर पर व्हाट्सऐप पर शुरू की गई है। इसे जल्द ही फेसबुक और अन्य मंचों पर भी उपलब्ध कराया जाएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की प्रौद्योगिकी के व्यापक इस्तेमाल से ऑनलाइन सामग्री की विश्वसनीयता को लेकर चुनौतियां बढ़ सकती हैं और उपयोगकर्ता सार्वजनिक रूप से साझा की जाने वाली सामग्री के प्रति अधिक सतर्क हो सकते हैं।

विशेषज्ञों ने इस मॉडल के उस फीचर पर चिंता जताई है, जिसमें उपयोगकर्ता किसी इंस्टाग्राम यूजरनेम को निर्देश (प्रॉम्प्ट) में डालकर सार्वजनिक प्रोफाइल में मौजूद तस्वीरों के आधार पर एआई जनित तस्वीर तैयार कर सकते हैं।

काउंटरपॉइंट रिसर्च के वरिष्ठ विश्लेषक प्राचीर सिंह ने कहा कि यह बदलाव सार्वजनिक इंस्टाग्राम अकाउंट के मायने बदल देता है। अब इसका मतलब केवल दृश्यता नहीं, बल्कि किसी व्यक्ति की छवि का एआई सामग्री के लिए उपयोग भी हो सकता है, वह भी बिना स्पष्ट अनुमति के।

साइबरमीडिया रिसर्च (सीएमआर) के उपाध्यक्ष (उद्योग शोध समूह) प्रभु राम ने कहा कि व्यवस्था से अलग होने का ‘ऑप्ट-आउट’ मॉडल आम तौर पर उपयोगकर्ताओं की निष्क्रियता का फायदा उठाता है, न कि सूचित सहमति को दर्शाता है।

भाषा प्रेम

प्रेम अजय

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