Scindia Family Property Dispute Settlement / Image Source : X
ग्वालियर : Scindia Family Property Dispute Settlement : देश के सबसे चर्चित राजघरानों में शुमार ग्वालियर के सिंधिया राजपरिवार का दशकों पुराना करीब 40 हजार करोड़ रुपये की संपत्ति विवाद अब सुलझने की ओर बढ़ता दिख रहा है। ग्वालियर जिला अदालत में आज 35 पेज का समझौता आवेदन पेश किया गया। अब इस मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई को होगी। क्या है इस समझौते का फॉर्मूला और किन ऐतिहासिक संपत्तियों का होगा बंटवारा।
देश के सबसे चर्चित राजघरानों में शामिल सिंधिया राजपरिवार का दशकों पुराना अरबों रुपये की संपत्ति का विवाद अब खत्म होने की दहलीज पर है। Rajmata Vijaya Raje Scindia Trust Divya Shivling आज ग्वालियर जिला न्यायालय में इस समझौते को लेकर 35 पेज का आवेदन भी पेश किया गया। लेकिन कोर्ट ने फिलहाल इस पर कोई निर्णय नहीं दिया है। यह विवाद केवल संपत्तियों के स्वामित्व तक सीमित नहीं रहा। समय के साथ इसमें उत्तराधिकार, वसीयत, ट्रस्टों के नियंत्रण और पारिवारिक अधिकारों जैसे कई कानूनी प्रश्न जुड़ते गए।
यही वजह है कि अलग-अलग दौर में देश की विभिन्न अदालतों में इससे जुड़े अनेक मुकदमे पहुंचे। हालांकि अब ग्वालियर के जिला न्यायालय में न्यायाधीश विशाल अखंड की अदालत में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी बुआओं वसुंधरा राजे सिंधिया, यशोधरा राजे सिंधिया, उषा राजे राणा सहित अन्य पक्षकारों की ओर से समझौता आवेदन प्रस्तुत किया गया। अदालत ने रिकॉर्ड रूम से पुराने रिकॉर्ड तलब किए हैं। अब इस मामले में अगली सुनवाई 20 जुलाई को होगी, जहां समझौते की औपचारिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
Scindia Royal Wealth 40000 Crore Partition Formula इस विवाद की पृष्ठभूमि वर्ष 1971 में तैयार हुई, जब सिंधिया परिवार में संपत्तियों के बंटवारे को लेकर एक मौखिक समझौता हुआ। बाद में मुंबई की अदालत के आदेश के जरिए इस व्यवस्था को कानूनी स्वरूप दिया गया। राजमाता विजयाराजे सिंधिया को मिली संपत्तियों का बड़ा हिस्सा उनके द्वारा स्थापित 15 चैरिटेबल ट्रस्टों को हस्तांतरित कर दिया गया।
इस विवाद में ग्वालियर का जयविलास पैलेस, ऊषा किरण पैलेस होटल, छोटी विश्रांति, हिरण्यवन कोठी, उज्जैन का कालियादेह पैलेस, पुणे का पद्मा विलास पैलेस, मुंबई के समुद्र किनारे स्थित फ्लैट और दिल्ली की सिंधिया विला जैसी कई ऐतिहासिक और बहुमूल्य संपत्तियां शामिल हैं। रानी महल जैसी संयुक्त संपत्ति का भविष्य भी इसी समझौते से तय होगा।
जिला कोर्ट में जो समझौता पत्र पेश किया है, वह लगभग 35 पेज का है। उसमें सूत्रों की मानें तो “जो जहां काबिज, वही मालिक” के फॉर्मूले पर सहमति बनी है। यानी जिस पक्ष के पास अभी जो संपत्ति है, वही उसके नाम रहेगी। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं है। सिर्फ महलों का ही नहीं, बल्कि सर जयाजीराव ट्रस्ट, कृष्ण माधव ट्रस्ट और सिंधिया इन्वेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड जैसी संस्थाओं और कंपनियों से जुड़ी संपत्तियों का भविष्य भी इसी समझौते से तय होगा। चर्चा यह भी है कि राजमाता विजयाराजे सिंधिया की धरोहर माने जाने वाला पन्ने का दिव्य शिवलिंग भी समझौते के तहत ज्योतिरादित्य सिंधिया के हिस्से में आ सकता है। हालांकि इसकी भी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
सूत्रों के मुताबिक, समझौते का आधार बेहद व्यावहारिक रखा गया है। जिस पक्ष के कब्जे में फिलहाल जो संपत्ति है, वही उसके पास रहेगी। यानी “जो जहां काबिज, वही मालिक” के फॉर्मूले पर सहमति बनी है। हालांकि इस फॉर्मूले की अभी न्यायालय या पक्षकारों की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। विवाद ने नया मोड़ वर्ष 1989 में लिया, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संपत्तियों के बंटवारे को अदालत में चुनौती देने के साथ स्वयं को उत्तराधिकारी घोषित किए जाने का दावा भी प्रस्तुत किया। इसके बाद मामला केवल हिस्सेदारी का नहीं रहा, बल्कि उत्तराधिकार और संपत्तियों के नियंत्रण का व्यापक कानूनी विवाद बन गया।
हालांकि अब जिला अदालत में पेश किए गए करीब 35 पन्नों के समझौता पत्र में संपत्तियों के बंटवारे का पूरा खाका बताया जा रहा है। यदि अदालत इस समझौते को मंजूरी देती है, तो दशकों पुराने पारिवारिक विवाद का पटाक्षेप हो जाएगा। हालांकि अंतिम फैसला अब 20 जुलाई की सुनवाई पर निर्भर करेगा। सिंधिया राजघराने के संपत्ति विवाद के समझौते के फॉर्मूले पर देश के बाकी राजघरानों की निगाह टिकी हुई है। क्योंकि यह फैसला बाकी राजघरानों के लिए नजीर बन सकता है।