नयी दिल्ली, छह जून (भाषा) भारतीय अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2025-26 में भले ही उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करते हुए 7.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है लेकिन अर्थशास्त्रियों ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, ऊंची ऊर्जा कीमतों और वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण चालू वित्त वर्ष में वृद्धि दर धीमी पड़ने को लेकर आगाह किया है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) की तरफ से शुक्रवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, जनवरी-मार्च तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही, जो अक्टूबर-दिसंबर तिमाही के आठ प्रतिशत से मामूली कम है। हालांकि पूरे वित्त वर्ष की वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत रही, जो दूसरे अग्रिम अनुमान 7.6 प्रतिशत से अधिक है।
इन आंकड़ों पर अर्थशास्त्रियों का कहना है कि मजबूत घरेलू मांग, निजी खपत और निवेश गतिविधियों में तेजी के कारण घरेलू अर्थव्यवस्था पश्चिम एशिया में मार्च के दौरान तेज हुए संघर्ष के शुरुआती असर को झेलने में सक्षम रही।
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी ने कहा कि प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद मार्च तिमाही की वृद्धि पिछली 10 तिमाहियों के औसत से काफी ऊपर रही।
वहीं, डेलॉयट इंडिया की अर्थशास्त्री रुमकी मजूमदार ने कहा कि वृद्धि व्यापक आधार पर रही और इसमें मांग एवं उत्पादन दोनों का योगदान रहा। सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) की वृद्धि दर 7.9 प्रतिशत रही, जो जीडीपी वृद्धि से अधिक है। यह संकेत देता है कि सेवा, विनिर्माण और निर्माण क्षेत्रों में मजबूती बनी रही।
हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि चालू वित्त वर्ष 2026-27 में वृद्धि दर में गिरावट की आशंका है और यह घटकर 6.5-6.6 प्रतिशत के आसपास रह सकती है। इसका कारण कच्चे तेल और अन्य जिंसों की बढ़ती कीमतें, वैश्विक वृद्धि में सुस्ती, आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं और सामान्य से कम मानसून की आशंका है।
क्रिसिल ने चालू वित्त वर्ष के लिए 6.6 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान बरकरार रखा है, जबकि एचडीएफसी बैंक ने 6.5 प्रतिशत का अनुमान जताया है। दोनों संस्थानों ने इस बात को लेकर आगाह किया है कि बढ़ती लागत, कमजोर निर्यात, ऊंची महंगाई और निवेश गतिविधियों में संभावित कमी आर्थिक गति को प्रभावित कर सकती है।
डीबीएस बैंक ने कहा कि अर्थव्यवस्था का नए वित्त वर्ष में प्रवेश अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में हुआ है, लेकिन पश्चिम एशिया संघर्ष का पूरा असर अभी आंकड़ों में नजर आना बाकी है। बैंक ने ऊर्जा और खाद्य कीमतों में वृद्धि तथा वित्तीय परिस्थितियों के सख्त होने को जोखिम बताया।
मजूमदार ने कहा कि सरकार के अग्रिम पूंजीगत व्यय कार्यक्रम और स्थिर ईंधन कीमतों जैसी नीतियों ने संकट के प्रभाव को सीमित रखने में मदद की है। उन्होंने उम्मीद जताई कि घरेलू मांग और नीतिगत समर्थन के चलते भारत बाहरी झटकों को कुछ हद तक झेल सकेगा।
डीबीएस की वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं कार्यकारी निदेशक राधिका राव ने कहा, ‘चौथी तिमाही में ग्रामीण और शहरी मांग अपेक्षाकृत मजबूत रही, लेकिन उर्वरक एवं सीमेंट जैसे कुछ विनिर्माण क्षेत्रों पर लागत से जुड़े दबावों का असर देखा गया।’
निजी क्षेत्र के एचडीएफसी बैंक ने कहा कि पिछले वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि का आधार व्यापक बना रहा जिसमें उपभोक्ता खर्च एवं निवेश गतिविधियों दोनों में सुधार देखने को मिला, जो कि एक सकारात्मक संकेत है। खासकर चौथी तिमाही में सरकारी निवेश धीमा पड़ने पर निजी निवेश ने इस तेजी को समर्थन दिया।
हालांकि एचडीएफसी बैंक ने आगाह करते हुए कहा, ‘हालिया रुझानों को सीधे भविष्य पर लागू कर देना ठीक नहीं होगा। पश्चिम एशिया संघर्ष से उत्पन्न व्यवधानों का असर आने वाले महीनों में आर्थिक आंकड़ों में धीरे-धीरे दिखाई देना शुरू होगा।’
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत घरेलू बुनियादों के कारण स्थिर बनी हुई है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों के चलते वित्त वर्ष 2026-27 में चुनौतियां बढ़ने की आशंका है।
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