मुंबई, दो अगस्त (भाषा) मुद्रास्फीति के बढ़ते जोखिमों और एफसीएनआर (बी) जमा योजना पर रुख को लेकर प्रतीक्षा के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) अपनी अगस्त की मौद्रिक नीति समीक्षा में प्रमुख नीतिगत दर रेपो को यथावत रख सकता है। देश के 10 अर्थशास्त्रियों और ट्रेजरी प्रमुखों के एक सर्वेक्षण से यह बात सामने आई है।
ज्यादातर उत्तरदाताओं का अनुमान है कि केंद्रीय बैंक भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और असमान मानसून से मुद्रास्फीति के बढ़ते जोखिमों के बीच आक्रामक रुख अपनाते हुए अपनी नीतिगत स्थिति को ‘तटस्थ’ बनाए रखेगा।
अर्थशास्त्रियों ने कहा कि केंद्रीय बैंक ”देखो और प्रतीक्षा करो” की मुद्रा में रहेगा क्योंकि वह महंगाई के उभरते परिदृश्य का आकलन कर रहा है।
इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा, ‘‘फिलहाल, मुद्रास्फीति नरम बनी हुई है और ऐसे में यथास्थिति ही सबसे अच्छा नीतिगत विकल्प है।”
जन स्मॉल फाइनेंस बैंक के ट्रेजरी प्रमुख गोपाल त्रिपाठी ने कहा कि केंद्रीय बैंक मानसून की स्थिति और एफसीएनआर (बी) योजना की सफलता का इंतजार करेगा।
नीतिगत दरों पर फैसला करने के लिए मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) तीन अगस्त से पांच अगस्त के बीच बैठक करेगी। केंद्रीय बैंक ने वृद्धि दर को बढ़ावा देने के लिए पिछले साल से रेपो दर में 1.25 प्रतिशत की कटौती की है।
अगस्त में ठहराव की उम्मीदों के बावजूद, अधिकांश उत्तरदाता वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान नीतिगत दर के ऊपर जाने की संभावना देखते हैं। यदि मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ता है, तो अधिकांश प्रतिभागी चालू वित्त वर्ष के दौरान कम से कम दो बार दर वृद्धि की उम्मीद करते हैं।
आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की अर्थशास्त्री गौरा सेनगुप्ता ने कहा कि मुद्रास्फीति का दबाव काफी हद तक आपूर्ति-प्रेरित है और इसके लिए तत्काल मौद्रिक नीति प्रतिक्रिया की आवश्यकता नहीं हो सकती है।
भाषा अजय पाण्डेय
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