नयी दिल्ली, पांच अप्रैल (भाषा) स्थानीय शेयर बाजार में इस सप्ताह उतार-चढ़ाव रहने की संभावना है क्योंकि निवेशक भारतीय रिजर्व बैंक के मौद्रिक नीति संबंधी निर्णय, प्रमुख वैश्विक आर्थिक आंकड़ों और पश्चिम एशिया संघर्ष के प्रभाव पर नजर रख रहे हैं। विश्लेषकों ने यह राय जताई है।
विश्लेषकों ने कहा कि कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों के निवेश का रुख भी बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।
जियोजीत इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के शोध प्रमुख विनोद नायर ने कहा, ‘‘देश में इस समय भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बैठक सबसे महत्वपूर्ण है। निवेशक महंगाई और आर्थिक वृद्धि पर केंद्रीय बैंक के रुख को ध्यान से देखेंगे।’’
उन्होंने कहा, ‘‘प्रमुख नीतिगत दर रेपो में फिलहाल बदलाव की संभावना नहीं है, लेकिन कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से महंगाई का दबाव बना हुआ है। वहीं विनिर्माण गतिविधियों में सुस्ती के संकेत मिल रहे हैं। ऐसे में केंद्रीय बैंक के रुख और भविष्य के अनुमान पर नजर रहेगी।’
नायर ने कहा, ‘‘वैश्विक स्तर पर अमेरिका के मार्च महीने के महंगाई आंकड़े भी महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि इससे वहां की मौद्रिक नीति और डॉलर की स्थिति पर असर पड़ेगा, जिसका प्रभाव भारत जैसे उभरते बाजारों पर भी पड़ सकता है।’’
उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक घटनाक्रम बाजार की धारणा को प्रभावित करने वाला प्रमुख कारक बना रहेगा।
उन्होंने आगे कहा, ‘‘तीन दिन के अंतराल के बाद भारतीय बाजार खुलेंगे और सप्ताहांत में युद्ध से जुड़े घटनाक्रमों के प्रति संवेदनशील रहेंगे। कच्चे तेल की कीमतों की दिशा और युद्धविराम के किसी ठोस संकेत से या तो बाजार में तेजी आ सकती है या फिर मौजूदा बिकवाली का दौर जारी रह सकता है।’’
पिछले सप्ताह में, बीएसई के बेंचमार्क सेंसेक्स में 263.67 अंक या 0.35 प्रतिशत की गिरावट रही जबकि एनएसई निफ्टी 106.5 अंक या 0.46 प्रतिशत नुकसान में रहा।
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड के शोध प्रमुख सिद्धार्थ खेमका ने कहा कि इस सप्ताह भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है और निवेशकों की धारणा पश्चिम एशिया की स्थिति से प्रभावित रहेगी।
खेमका ने कहा, “कुल मिलाकर बाजार में उतार-चढ़ाव बने रहने की संभावना है, क्योंकि भू-राजनीतिक घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव, विदेशी संस्थागत निवेशकों के प्रवाह और वैश्विक आर्थिक आंकड़े निवेशकों की धारणा को प्रभावित करते रहेंगे।”
विश्लेषकों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है तो कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आती है तो बाजार को राहत मिल सकती है, जबकि तनाव बढ़ने की स्थिति में निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता कम हो सकती है और विदेशी निवेश पर दबाव बना रह सकता है।
भाषा योगेश अजय
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