मुंबई, दो अप्रैल (भाषा) पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण आपूर्ति श्रृंखला में आई रुकावटों और बढ़ती कीमतों के चलते चालू वित्त वर्ष में भारत में रिफाइंड सूरजमुखी तेल की बिक्री में लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट आने की संभावना है। बढ़ती कीमतों के कारण उपभोक्ता सस्ते विकल्पों की ओर रुख कर सकते हैं। बृहस्पतिवार को जारी एक रिपोर्ट में यह जानकाी दी गई है।
क्रिसिल रेटिंग्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दोहरी चुनौतियों के कारण, जिनसे मांग पर असर पड़ेगा, चालू वित्त वर्ष में भारतीय रिफाइंड सूरजमुखी तेल की बिक्री में 10 प्रतिशत की गिरावट आने की संभावना है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पहली चुनौती पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण आपूर्ति श्रृंखला में आई रुकावटें हैं, और दूसरी चुनौती लॉजिस्टिक्स लागत में वृद्धि के कारण बढ़ी हुई कीमतें हैं। इन दोनों कारणों से उपभोक्ता सस्ते विकल्पों, जैसे कि राइस ब्रान (चावल की भूसी का तेल) और सोयाबीन तेल का रुख कर सकते हैं।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस साल राजस्व लगभग स्थिर रहने की उम्मीद है, क्योंकि बढ़ी हुई कीमतें बिक्री में आई गिरावट की भरपाई कर देंगी।
क्रिसिल रेटिंग्स ने कहा कि सूरजमुखी तेल रिफाइनरी कंपनियों का मुनाफा भी स्थिर रहेगा। पहले से कम कीमत पर खरीदे गए स्टॉक से होने वाला लाभ, बिक्री में आई गिरावट के कारण होने वाले नकारात्मक परिचालन प्रभाव की काफी हद तक भरपाई कर देगा।
रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली रुकावटें, कम समय के लिए घरेलू सूरजमुखी तेल रिफाइनरी कंपनियों के पास मौजूद स्टॉक के स्तर को सीमित कर देंगी।
हालांकि, इससे कार्यशील पूंजी का कुछ हिस्सा अस्थायी रूप से मुक्त होगा, जिससे नकदी प्रवाह को मदद मिलेगी।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सालाना 2.5-2.6 करोड़ टन खाद्य तेल की कुल खपत में से 12-14 प्रतिशत हिस्सा रिफाइंड सूरजमुखी तेल का होता है।
यह उद्योग कच्चे सूरजमुखी तेल के आयात पर बहुत अधिक निर्भर है, जिसके कारण यह वैश्विक व्यापार में आने वाली रुकावटों और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
आयात का एक बड़ा हिस्सा यूक्रेन और रूस से आता है। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण, जहाज अब लंबे रास्तों (जैसे कि ‘केप ऑफ गुड होप’ के रास्ते) से यात्रा कर रहे हैं, जिससे यात्रा की दूरी और उसमें लगने वाला समय, दोनों ही बढ़ गए हैं।
इसके अलावा, संघर्ष-संवेदनशील क्षेत्रों से गुजरने वाले जहाजों के लिए ‘युद्ध-जोखिम बीमा’ का प्रीमियम भी बढ़ गया है, जिसके कारण कच्चे सूरजमुखी तेल की पहुंचने तक की कुल लागत में वृद्धि हुई है।
क्रिसिल रेटिंग्स की निदेशक जयश्री नंदकुमार ने कहा, ‘‘जब से पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू हुआ है, कच्चे सूरजमुखी तेल की औसत आयात कीमत बढ़कर अभी 1,420-1,440 डॉलर प्रति टन हो गई है, जबकि पिछले 12 महीनों में यह औसतन 1,275 डॉलर प्रति टन थी। भारतीय रुपये का कमज़ोर होना और शिपिंग लागत में बढ़ोतरी, भारत में कच्चे सूरजमुखी तेल की पहुंचने तक की लागत को और बढ़ा रही है।
कच्चे सूरजमुखी तेल की लागत में बढ़ोतरी का असर आखिरकार रिफाइंड सूरजमुखी तेल की खुदरा कीमतों पर पड़ेगा, जो अभी 170-175 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है, जबकि जनवरी, 2026 में इसकी कीमत 150 रुपये प्रति लीटर थी।
इसके अलावा, चूंकि चावल की भूसी (राइस ब्रान) और सोयाबीन तेल अभी सूरजमुखी तेल की तुलना में 10-20 रुपये प्रति लीटर सस्ता मिल रहा है, इसलिए लोग कुछ हद तक इन विकल्पों की ओर मुड़ सकते हैं।
भाषा राजेश राजेश अजय
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