द्वितीयक इस्पात क्षेत्र के एमएसएमई नवीकरणीय ऊर्जा से बिजली बिल घटा सकते हैं: रिपोर्ट

द्वितीयक इस्पात क्षेत्र के एमएसएमई नवीकरणीय ऊर्जा से बिजली बिल घटा सकते हैं: रिपोर्ट

द्वितीयक इस्पात क्षेत्र के एमएसएमई नवीकरणीय ऊर्जा से बिजली बिल घटा सकते हैं: रिपोर्ट
Modified Date: August 12, 2026 / 08:22 pm IST
Published Date: August 12, 2026 8:22 pm IST

नयी दिल्ली, 12 अगस्त (भाषा) भारत के द्वितीयक इस्पात क्षेत्र में काम करने वाले सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम (एमएसएमई) नवीकरणीय ऊर्जा अपनाकर अपने सालाना बिजली खर्च को 34 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन मे भी उल्लेखनीय कटौती कर सकते हैं। एक रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया है।

रिपोर्ट में कहा गया कि एमएसएमई द्वारा बड़े पैमाने पर संचालित किए जाने वाला द्वितीयक इस्पात क्षेत्र, देश के कुल कच्चे इस्पात उत्पादन में करीब 38-40 प्रतिशत का योगदान देता है।

यह क्षेत्र काफी बिखरा हुआ है और इसमें इकाइयों की उत्पादन क्षमता 1,000 टन प्रति वर्ष से लेकर एक लाख टन प्रति वर्ष तक है।

‘पावरिंग इंडियाज सेकेंडरी स्टील ट्रांजिशन: द बिजनेस केस फॉर क्लस्टर-बेस्ड रिन्यूएबल इलेक्ट्रिसिटी प्रोक्योरमेंट’ शीर्षक वाली रिपोर्ट पर्यावरण संगठनों और उद्योग निकायों के एक समूह ने बुधवार को जारी की है।

इसमें भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई), डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया, गैर-लाभकारी संस्था क्लाइमेट कैटेलिस्ट और शोध संस्थान जेएमके रिसर्च शामिल हैं।

रिपोर्ट में कहा गया कि द्वितीयक इस्पात क्षेत्र की एमएसएमई इकाइयों की परिचालन लागत में बिजली की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत तक है। नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल से प्रत्येक इकाई सालाना 2.2 करोड़ रुपये से 2.4 करोड़ रुपये तक की बचत कर सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार, बिजली लागत घटाने का सबसे प्रभावी तरीका यह हो सकता है कि कुछ इस्पात उत्पादक मिलकर एक नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र स्थापित करें और अपनी हिस्सेदारी के अनुपात में उससे बिजली प्राप्त करें।

जेएमके रिसर्च एंड एनालिटिक्स के वरिष्ठ सलाहकार प्रभाकर शर्मा ने बयान में कहा, ‘‘क्लस्टर आधारित तरीका एमएसएमई के नवीकरणीय ऊर्जा तक पहुंचने के तरीके में बुनियादी बदलाव ला सकता है। औद्योगिक संगठनों के माध्यम से मांग को एकत्रित करने से परियोजनाएं अधिक वित्तीय रूप से व्यवहार्य बनेंगी, संयंत्र का उचित आकार तय करने में मदद मिलेगी और कई उपभोक्ताओं के बीच इक्विटी भागीदारी बांटी जा सकेगी। इससे किसी एक इकाई पर निवेश का जोखिम भी कम होगा।’’

भाषा यासिर अजय

अजय


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