नयी दिल्ली, 10 जुलाई (भाषा) भारत के महत्वपूर्ण खनिजों में आत्मनिर्भरता हासिल करने के प्रयासों के बीच खनन और धातु कंपनियों की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। ऐसे में हितधारकों के साथ प्रभावी संवाद को निदेशक मंडल (बोर्ड) के स्तर पर रणनीतिक निर्णय प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उद्योग विशेषज्ञों ने यह बात कही।
विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों, स्वच्छ ऊर्जा संबंधी महत्वाकांक्षाओं और बदलते भू-राजनीतिक हालात को देखते हुए लिथियम, निकेल और रेयर अर्थ जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुरक्षा को प्राथमिकता दे रही है। ऐसे में कंपनियों के लिए कामकाज की चुनौतियां अब केवल पूंजी, प्रौद्योगिकी और नियामकीय मंजूरियों तक सीमित नहीं रह गई हैं।
उन्होंने कहा कि भविष्य में परियोजनाओं का सफल क्रियान्वयन केवल पूंजी, प्रौद्योगिकी और नियामकीय स्वीकृतियों पर ही नहीं, बल्कि हितधारकों के भरोसे और संचालन के लिए आवश्यक सामाजिक स्वीकृति (सोशल लाइसेंस टू ऑपरेट) बनाए रखने की क्षमता पर भी निर्भर करेगा।
वेदांता समूह के पूर्व समूह मुख्य कार्यपालक अधिकारी (ग्रुप सीईओ), हिंदुस्तान जिंक के पूर्व सीईओ और वर्तमान में भूमि वेंचर्स के सीईओ सुनील दुग्गल ने कहा कि खनन परियोजनाओं के अधिक हितधारक-केंद्रित होने के साथ निदेशक मंडलों की भूमिका भी काफी बढ़ गई है।
उन्होंने कहा, ‘‘ निदेशक मंडलों की भूमिका में बुनियादी बदलाव आया है। पहले ये चर्चाएं मुख्य रूप से पूंजी आवंटन, परिचालन और अनुपालन तक सीमित रहती थीं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ अब निदेशकों से कंपनी की प्रतिष्ठा, हितधारकों के विश्वास, ईएसजी (पर्यावरण, सामाजिक और सुशासन) प्रदर्शन तथा संगठन की दीर्घकालिक मजबूती पर भी निगरानी रखने की अपेक्षा की जाती है। खनन एवं धातु क्षेत्र में प्रभावी संवाद हितधारकों का रणनीतिक दृष्टिकोण निदेशक मंडल तक पहुंचाता है, जिससे बेहतर विचार-विमर्श तथा अधिक प्रभावी निर्णय लेने में मदद मिलती है।’’
इसी विषय पर निदेशक मंडल और मुख्य कार्यपालक अधिकारियों को संवाद एवं प्रतिष्ठा रणनीति पर सलाह देने वाले तथा ‘द फिफ्थ एस्टेट’ पुस्तक के लेखक पवन कौशिक ने कहा कि भारत की खनिज सुरक्षा संबंधी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निदेशक मंडलों को रणनीतिक निर्णयों में हितधारकों से जुड़े दृष्टिकोण को शामिल करना होगा।
उन्होंने कहा कि भारत की खनिज संबंधी महत्वाकांक्षाएं केवल निवेश और प्रौद्योगिकी के दम पर पूरी नहीं होंगी बल्कि इसके लिए हितधारकों का विश्वास भी उतना ही आवश्यक है।
कौशिक ने कहा, ‘‘ कंपनी स्तर पर होने वाला संवाद निदेशक मंडल तक हितधारकों का दृष्टिकोण पहुंचाता है। इससे निदेशक प्रतिष्ठा संबंधी जोखिमों का पहले से आकलन कर सकते हैं। सरकारों, नियामकों, निवेशकों, कर्मचारियों और स्थानीय समुदायों के साथ विश्वास कायम कर सकते हैं तथा निर्णय लागू होने से पहले उन्हें और बेहतर बना सकते हैं।’’
उन्होंने कहा कि वित्त, कानून, परिचालन और प्रौद्योगिकी जैसे पारंपरिक क्षेत्रों की विशेषज्ञता के साथ कंपनी स्तर पर संवाद भी निदेशक मंडलों की क्षमता को मजबूत करता है तथा रणनीतिक पहलों के प्रभावी क्रियान्वयन में मदद करता है।
उन्होंने कहा, ‘‘ जैसे-जैसे खनन परियोजनाएं अधिक हितधारक-आधारित होती जा रही हैं, निदेशक मंडलों के लिए प्रभावी संवाद , प्रतिष्ठा प्रबंधन और हितधारक सहभागिता का अनुभव रखने वाले स्वतंत्र निदेशक उपयोगी साबित हो सकते हैं और इससे कंपनी के मूल्य की रक्षा करने, परियोजनाओं के क्रियान्वयन संबंधी जोखिम कम करने और संगठन की दीर्घकालिक मजबूती बढ़ाने में मदद मिलेगी।’’
दुग्गल ने कहा कि हितधारकों का विश्वास अब काफी महत्वपूर्ण बन गया है।
उन्होंने कहा, ‘‘ आज खनन केवल खनिज संसाधनों की खोज एवं दोहन तक सीमित नहीं है। यह सरकारों, निवेशकों, कर्मचारियों और स्थानीय समुदायों का विश्वास अर्जित करने और उसे बनाए रखने का भी विषय है। प्रभावी संवाद निदेशक मंडलों को हितधारकों की अपेक्षाओं को समझने, क्रियान्वयन संबंधी जोखिम कम करने और संचालन के लिए आवश्यक सामाजिक स्वीकृति मजबूत करने में मदद करता है।’’
खनन उद्योग के संगठन फेडरेशन ऑफ इंडियन मिनरल इंडस्ट्रीज (एफआईएमआई) ने कहा कि खनन उद्योग जिम्मेदार और टिकाऊ विकास के लिए प्रतिबद्ध है।
एफआईएमआई ने कहा कि पर्यावरणीय और नियामकीय आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ टिकाऊ विकास संबंधी प्रयासों के बारे में स्पष्ट और पारदर्शी संवाद भी जरूरी है, ताकि आम लोगों का भरोसा बढ़े और निवेशकों का विश्वास मजबूत हो सके।
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