नयी दिल्ली, 23 जनवरी (भाषा) आगामी केंद्रीय बजट से पहले घरेलू इस्पात उद्योग ने सरकार से हरित इस्पात को बढ़ावा देने के लिए जरूरी कदम उठाने का आग्रह किया है। हरित इस्पात कार्बन उत्सर्जन कम करने के भारत के प्रयासों के तहत एक प्रमुख क्षेत्र है।
उद्योग से जुड़े पक्षों ने सरकार से हरित इस्पात उत्पादन में कबाड़ के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए भी उपाय करने का आग्रह किया है।
हरित इस्पात उत्पादन में कम कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीकों और वैकल्पिक कच्चे माल के अधिक उपयोग पर जोर दिया जाता है।
भारतीय इस्पात संघ (आईएसए) ने अपनी बजट पूर्व मांगों में हरित इस्पात उत्पादन के लिए कबाड़ के उपयोग को प्रोत्साहित करने वाले उपायों की मांग की है।
उद्योग निकाय ने सरकार से जीएसटी के तहत ‘रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म’ (आरसीएम) को पूरी धातु कबाड़ आपूर्ति श्रृंखला पर लागू करने का भी आग्रह किया है। इसका उद्देश्य कर चोरी रोकना, अनुपालन को सरल बनाना और कारोबार सुगमता में सुधार करना है।
जीएसटी के तहत ‘रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म’ कुछ अधिसूचित वस्तुओं या सेवाओं के लिए कर भुगतान की जिम्मेदारी आपूर्तिकर्ता से प्राप्तकर्ता (खरीदार) पर स्थानांतरित कर देता है।
उद्योग मंडल सीआईआई के कार्यकारी निदेशक तथा ग्लोबल इकोलेबलिंग नेटवर्क बोर्ड के चेयरमैन के. एस. वेंकटगिरि ने कहा कि जैसे-जैसे वैश्विक बाजार कम-कार्बन सामग्री की ओर बढ़ रहा है, खरीद प्रतिस्पर्धा का अहम मानक बनती जा रही है।
उन्होंने कहा, ‘‘हरित इस्पात को बढ़ावा देने का ढांचा खरीदारों के लिए स्पष्टता और विश्वसनीयता का मजबूत आधार देता है। यदि इस ढांचे को स्पष्ट खरीद रूपरेखा और भरोसेमंद वित्तीय समर्थन से जोड़ा जाए, जो संक्रमण काल में लागत अंतर को पाटने में मदद करे, तो भारत में हरित इस्पात का बड़े पैमाने पर विस्तार संभव है।’’
वेंकटगिरि ने कहा कि लक्षित वित्तीय साधनों के साथ रणनीतिक सार्वजनिक और निजी खरीद, जलवायु लक्ष्यों को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य हरित इस्पात बाजार में बदलने के लिए आवश्यक है।
इक्रा ने कहा कि कम कार्बन वाले हरित इस्पात की ओर बदलाव एक क्रमिक और दीर्घकालिक प्रक्रिया रहने की उम्मीद है, क्योंकि लागत और तकनीकी बाधाएं तेजी से कार्बन मुक्त होने की राह में रोड़ा बनी हुई हैं।
इक्रा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और समूह प्रमुख (कंपनी रेटिंग्स) गिरीशकुमार कदम ने कहा कि केवल हरित ऊर्जा की ओर रुख करने से ही ब्लास्ट फर्नेस-बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस आधारित मिलों के लिए उत्सर्जन में लगभग 13 प्रतिशत और प्रत्यक्ष रूप से कम किए गए लोहे आधारित इस्पात इकाइयों के लिए 22 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।
क्लाइमेट कैटलिस्ट की निदेशक साक्षी बालानी ने कहा कि पिछले तीन वर्षों में इस्पात क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने पर काम करते हुए हमने पाया है कि भारत में हरित इस्पात के विस्तार में सबसे बड़ी बाधा तकनीक या इच्छा की कमी नहीं है, बल्कि स्पष्ट मांग का संकेत न होना है।
उन्होंने कहा कि हमारा शोध बताता है कि जब खरीद नियमों में कम-कार्बन वाले इस्पात को मान्यता दी जाती है और उसकी अतिरिक्त लागत को जोड़ा जाता है, तो इसे बड़े पैमाने पर अपनाया जा सकता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले के इंडिया एनर्जी एंड क्लाइमेट सेंटर में औद्योगिक और व्यापार नीतियों की निदेशक नीलिमा जैन ने कहा कि भारत को हरित-हाइड्रोजन इस्पात के लिए एक भरोसेमंद बाजार बनाने की जरूरत है और इसके लिए सरकारी खरीद सबसे अच्छा जरिया है।
उन्होंने कहा कि सरकार को इसे चरणबद्ध तरीके से अनिवार्य करना चाहिए और बजट में ऐसे उपाय करने चाहिए जिससे शुरुआती बढ़ी हुई कीमतों और जोखिमों का बोझ कम हो सके।
भाषा रमण सुमित
रमण