अदालत ने वेदांता को गुजरात के अपतटीय तेल क्षेत्र संबंधी अनुबंध विस्तार नहीं देने का फैसला बरकरार
अदालत ने वेदांता को गुजरात के अपतटीय तेल क्षेत्र संबंधी अनुबंध विस्तार नहीं देने का फैसला बरकरार
नयी दिल्ली, 22 जुलाई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने गुजरात के एक अपतटीय तेल क्षेत्र के लिए वेदांता के साथ उत्पादन साझेदारी अनुबंध (पीएससी) की अवधि बढ़ाने से इनकार करने और उसके परिचालन का जिम्मा ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) को सौंपने के केंद्र सरकार के फैसले को बुधवार को बरकरार रखा।
न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने वेदांता लिमिटेड की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के 19 सितंबर 2025 के आदेश को निरस्त करने का अनुरोध किया गया था।
मंत्रालय ने इस आदेश के जरिये गुजरात के सुवाली तेल क्षेत्र के लिए 20 जून, 1998 के उत्पादन साझेदारी अनुबंध की अवधि बढ़ाने संबंधी कंपनी के वर्ष 2021 के आवेदन को खारिज कर दिया था।
याचिका में ओएनजीसी को निर्देश देकर पीएससी क्षेत्र में कंपनी की परिसंपत्तियों और परिचालन का तत्काल कार्यभार संभालने के आदेश को भी निरस्त करने का अनुरोध किया गया था।
केंद्र सरकार, वेदांता, ओएनजीसी और इन्वेनायर पेट्रोडाइन लिमिटेड के बीच हुए मूल पीएससी की अवधि 25 वर्ष यानी 30 जून 1998 से 29 जून 2023 तक थी। कुछ निर्धारित परिस्थितियों में इसे एक निश्चित अवधि के लिए बढ़ाया जा सकता था।
पीएससी के तहत वेदांता नामित परिचालक थी।
पांच अंतरिम विस्तार दिए जाने के बाद अंतिम अंतरिम विस्तार 29 सितंबर, 2024 को समाप्त हो गया।
वेदांता ने जून 2021 में अनुबंध की अवधि 10 वर्ष बढ़ाकर 29 जून 2033 तक करने का अनुरोध किया था।
अपने फैसले में अदालत ने कहा कि सरकार के हिस्से की राशि को ‘‘एकतरफा’’ रूप से काटकर उत्पाद शुल्क से संबंधित अपनी देनदारी की भरपाई करने अथवा अपने आर्थिक लाभ को बनाए रखने का कंपनी का कदम अनुबंध विस्तार से इनकार करने के लिए पर्याप्त आधार था।
अदालत ने कहा, ‘‘ प्रथम दृष्टया यह एकतरफा कटौती सद्भावना से नहीं की गई थी। याचिकाकर्ता भारत के लोगों के सार्वजनिक संसाधनों का प्रबंधन कर रहा है। पीएससी की व्यवस्था ऐसी है कि निजी कंपनी को सरकार का हिस्सा देना होता है। इससे कुछ हद तक निजी कंपनी प्रभावशाली स्थिति में आ जाती है क्योंकि सरकार के हिस्से का नियंत्रण उसके हाथ में रहता है। ऐसे में उसे अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए। सरकार को किसी निजी कंपनी की मनमानी, उसकी अपनी व्याख्याओं या इच्छाधारित निष्कर्षों के आधार पर बंधक नहीं बनाया जा सकता जो केंद्र के हिस्से की अनदेखी करे।’’
अदालत ने कहा, ‘‘उत्पादन साझेदारी अनुबंध की अवधि बढ़ाने के याचिकाकर्ता के आवेदन को खारिज करने के पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। इसलिए यह याचिका और इससे संबंधित सभी लंबित आवेदन खारिज किए जाते हैं।’’
वेदांता ने दलील दी थी कि हालांकि अनुबंध विस्तार उसका अपरिहार्य अधिकार नहीं था, लेकिन वर्ष 2025 का आदेश विस्तार नीति के उल्लंघन में, अप्रासंगिक आधारों पर और उचित विचार किए बिना पारित किया गया।
वहीं, केंद्र सरकार ने कहा कि उसका फैसला जनहित में और सार्वजनिक न्यास सिद्धांत के तहत उसके दायित्वों के अनुरूप लिया गया है।
उच्च न्यायालय ने वेदांता की याचिका पर जनवरी में अंतरिम आदेश पारित करते हुए पक्षों को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया था।
भाषा निहारिका माधव
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