नयी दिल्ली, 28 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने यह तय करने के लिए मामले को तीन न्यायाधीशों की बड़ी पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया है कि दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत वसूली कार्यवाहियों पर लगी अस्थायी रोक क्या चेक बाउंस मामलों पर भी लागू होगी।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने बुधवार को एक फैसले में कहा कि इस मुद्दे पर व्यापक विचार और प्राधिकारिक निर्णय के लिए इसे बड़ी पीठ के समक्ष रखा जाना चाहिए।
पीठ ने दो प्रमुख सवाल बड़ी पीठ के विचार के लिए तय किए हैं। पहला, क्या आईबीसी के तहत लगी अस्थायी रोक चेक बाउंस मामलों (परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138) की पूरी कार्यवाही पर लागू होगी या केवल मुआवजे की वसूली तक सीमित रहेगी। दूसरा, क्या धारा 138 की प्रकृति मुख्य रूप से आपराधिक है या अर्ध-आपराधिक।
शीर्ष अदालत ने कहा कि धारा 138 के तहत कार्यवाही भले ही सिविल देनदारी से जुड़ी हो, लेकिन इसका प्रमुख उद्देश्य आपराधिक है, ताकि वाणिज्यिक लेनदेन में भरोसा बना रहे।
पीठ ने यह भी कहा कि मुआवजे से जुड़ा हिस्सा सिविल प्रकृति का होता है और यदि उसे रोका नहीं गया तो इससे देनदार की संपत्ति प्रभावित हो सकती है। इसलिए इस हिस्से पर अस्थायी रोक लागू हो सकती है।
यह मामला ‘दिनेशचंद सुराणा बनाम यूको बैंक’ से जुड़ा है, जिसमें यह सवाल उठा था कि क्या व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया के दौरान आरोपी चेक बाउंस मामलों की आपराधिक कार्यवाही रोक सकता है।
पीठ ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उचित आदेश के लिए रखे, ताकि तीन-सदस्यीय पीठ का गठन किया जा सके।
भाषा प्रेम
प्रेम अजय
अजय