नयी दिल्ली, 29 अप्रैल (भाषा) पश्चिम एशिया संघर्ष से आपूर्ति पक्ष को बड़ा झटका लगने से महंगाई, व्यापार और वित्तीय प्रवाह पर जोखिम बढ़ गया है। हालांकि मजबूत घरेलू मांग, नीतिगत समर्थन, सुदृढ़ वित्तीय प्रणाली और सार्वजनिक निवेश से भारतीय अर्थव्यवस्था को कुछ हद तक सुरक्षा मिलेगी। वित्त मंत्रालय ने अपनी मासिक रिपोर्ट में यह बात कही है।
अप्रैल महीने की मासिक आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति को लेकर लंबी अनिश्चितता देश की वृहद आर्थिक स्थिरता की मजबूती की परीक्षा ले सकती है।
इसके साथ ही रिपोर्ट में ‘अल नीनो’ के प्रभाव से इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कम रहने की आशंका जताई गई है। ऐसा होने से अधिकांश जिलों में औसत से कम बारिश होने का अनुमान है।
‘अल नीनो’ एक खास जलवायु स्थिति है, जिसमें प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, जिससे भारत में मानसून कमजोर पड़ जाता है।
मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है कि इन परिस्थितियों में महंगाई, राजकोषीय घाटा और चालू खाते का घाटा बढ़ने का जोखिम है, जबकि आर्थिक वृद्धि पर दबाव पड़ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत वित्त वर्ष 2026-27 में मजबूती के साथ कदम रख रहा था और वृद्धि दर 7-7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान था लेकिन पश्चिम एशिया युद्ध के कारण वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में बदलाव से यह अनुमान प्रभावित हुआ है।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
रिपोर्ट में पश्चिम एशिया संकट के बीच आपूर्ति पक्ष से जुड़े झटके की चेतावनी देते हुए कहा गया है कि बढ़ती कीमतों और आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार धीमी होने से मांग में कमी भी चिंता का विषय है। इसके साथ कंपनियों द्वारा बढ़ती लागत को उपभोक्ताओं पर डाले जाने से महंगाई भी बढ़ सकती हैं।
इसका असर कच्चे माल से अंतिम उत्पाद बनाने वाले प्रसंस्करण और विपणन उद्योगों पर व्यापक रूप से पड़ेगा। इनके पेट्रोलियम क्षेत्र पर निर्भर होने से पूरी अर्थव्यवस्था में ही लागत का दबाव बढ़ सकता है।
कृषि जैसे अहम क्षेत्रों में लागत दबाव कम करने के लिए सरकार ने उर्वरक उत्पादन के लिए गैस आवंटन बढ़ाने, सीमा शुल्क में छूट और खरीफ सत्र के लिए पोषक-तत्व आधारित सब्सिडी में करीब 12 प्रतिशत वृद्धि जैसे कदम उठाए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम एशिया संकट से निवेशकों का भरोसा प्रभावित हुआ है, जिसका असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर अधिक पड़ा है। रुपये की कमजोरी भी महंगाई को बढ़ा सकती है क्योंकि इससे आयात महंगे हो जाते हैं।
मंत्रालय ने कहा कि खाड़ी क्षेत्र में तेल एवं गैस के आपूर्ति ढांचे को सामान्य होने में कई महीने लग सकते हैं। यदि इसके साथ कमजोर मानसून भी जुड़ता है, तो महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।
हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली के प्रमुख संकेतक- पूंजी पर्याप्तता, नकदी और परिसंपत्ति गुणवत्ता मजबूत बने हुए हैं, जिससे वित्तीय स्थिरता पर बड़ा खतरा नहीं है। रिजर्व बैंक भी पर्याप्त नकदी बनाए रखने के लिए सक्रिय रहेगा।
रिपोर्ट के मुताबिक, हाल में हुए मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) भारतीय निर्यात को बढ़ावा देने और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में जुड़ाव को मजबूती देने में मदद करेंगे।
वित्त मंत्रालय ने कहा कि कई देशों के लिए चुनौती बनी हुई वैश्विक अस्थिरता भारत के लिए अवसर भी बन सकती है। मजबूत घरेलू आधार और रणनीतिक स्वायत्तता के साथ भारत विनिर्माण, सेवाओं और बड़े उपभोक्ता बाजार के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।
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