देश में 2030 के बाद घटेगा कामकाजी आबादी का अनुपात, रोजगार सृजन की रफ्तार बढ़ाना जरूरी: रिपोर्ट

देश में 2030 के बाद घटेगा कामकाजी आबादी का अनुपात, रोजगार सृजन की रफ्तार बढ़ाना जरूरी: रिपोर्ट

देश में 2030 के बाद घटेगा कामकाजी आबादी का अनुपात, रोजगार सृजन की रफ्तार बढ़ाना जरूरी: रिपोर्ट
Modified Date: March 17, 2026 / 02:51 pm IST
Published Date: March 17, 2026 2:51 pm IST

नयी दिल्ली, 17 मार्च (भाषा) देश में आने वाले समय में रोजगार सृजन की गति बढ़ाने की जरूरत और बढ़ जाएगी क्योंकि जनसांख्यिकीय लाभ सीमित समय के लिए ही उपलब्ध रहेगा और 2030 के बाद कामकाजी आयु वर्ग की आबादी का अनुपात घटने लगेगा। एक रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की रिपोर्ट ‘भारत में कामकाज की स्थिति-2026’ में देश के युवाओं की शिक्षा, रोजगार और श्रम बाजार से जुड़े कई अहम रुझानों को रेखांकित किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, शिक्षित एवं आकांक्षी युवाओं की बढ़ती संख्या को रोजगार बाजार में प्रभावी ढंग से शामिल करना भारत के जनसांख्यिकीय लाभ को आर्थिक वृद्धि में तब्दील करने के लिए निर्णायक होगा।

इसमें कहा गया है कि 2030 के बाद कामकाजी आबादी का अनुपात घटने लगेगा जिससे रोजगार सृजन की गति बढ़ाने की जरूरत और अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी।

रिपोर्ट कहती है, पिछले चार दशक में युवाओं की शिक्षा के स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और उच्च शिक्षा में नामांकन दर 28 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जिसमें महिलाओं की भागीदारी खासतौर पर बढ़ी है। हालांकि, पुरुषों के नामांकन में गिरावट दर्ज की गई है। यह 2017 के 38 प्रतिशत से घटकर 2024 के अंत तक 34 प्रतिशत रह गई है। इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि पुरुष अपने परिवार की जरूरत को पूरा करने के लिए कमाने के अवसर तलाशने लगते हैं।

उच्च शिक्षा संस्थानों का दायरा भी बढ़ा है। प्रति लाख युवाओं पर कॉलेज की संख्या 2010 के 29 से बढ़कर 2021 में 45 हो गई, जिसमें निजी संस्थानों की बड़ी भूमिका रही है। इसके बावजूद क्षेत्रीय असमानताएं बनी हुई हैं और शिक्षकों की कमी एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई है। निर्धारित मानकों के मुकाबले निजी और सरकारी कॉलेजों में शिक्षक-छात्र अनुपात काफी अधिक है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2010 के बाद औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) की संख्या में करीब 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, लेकिन इसके साथ गुणवत्ता को लेकर चिंताएं भी सामने आई हैं, खासकर निजी संस्थानों में।

उच्च शिक्षा में गरीब परिवारों की भागीदारी बढ़ी है, जो 2007 के आठ प्रतिशत से बढ़कर 2017 में 15 प्रतिशत हो गई है लेकिन आर्थिक बाधाएं अब भी बनी हुई हैं। महंगे पेशेवर पाठ्यक्रमों…..मसलन इंजीनियरिंग व मेडिकल में अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग के छात्र-छात्राओं की भागीदारी अधिक रहती है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की अध्यक्ष इंदु प्रसाद ने कहा, ‘‘आज पहले से अधिक युवा शिक्षित और जागरूक हैं और वे कुछ करने के इच्छुक हैं, जो एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।’’

देश में युवाओं (15-29 वर्ष) की उच्च शिक्षा तक पहुंच में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हालांकि, रोजगार से जुड़ी चुनौतियां अब भी बरकरार हैं। 15–25 वर्ष के स्नातकों में बेरोजगारी दर करीब 40 प्रतिशत और 25–29 वर्ष में करीब 20 प्रतिशत है।

रिपोर्ट के मुताबिक, स्नातक होने के एक वर्ष के भीतर बहुत कम संख्या में ही युवाओं को स्थायी रोजगार मिल पाता है। हालांकि, स्नातक युवाओं को आय के मामले में लाभ मिलता है और उनकी शुरुआती कमाई गैर-स्नातकों के मुकाबले लगभग दोगुनी होती है। इसके बावजूद 2011 के बाद युवा पुरुष स्नातकों के वेतन में वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ी है।

इसमें सामने आया कि युवा तेजी से कृषि क्षेत्र से हटकर विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं। सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी), मोटर वाहन और व्यावसायिक सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, जबकि पेशेवर क्षेत्र में जाति एवं स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव कम हुआ है।

रिपोर्ट की मुख्य लेखिका एवं विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर रोजा अब्राहम ने कहा कि यह अध्ययन पिछले 40 वर्ष के आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित है और शिक्षा से रोजगार तक युवाओं की यात्रा तथा उसमें आए बदलावों को दर्शाता है।

भाषा निहारिका अजय

अजय


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