नयी दिल्ली, 16 फरवरी (भाषा) राष्ट्रीय राजधानी स्थित ‘भारत मंडपम’ में ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ को संबोधित करते हुए साउथ एशियन इंस्टिट्यूट फॉर पीस एंड रिकॉन्सिलिएशन (एसएआईपीआर) के अध्यक्ष एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पंड्या ने कहा कि कृत्रिम मेधा (एआई) 21वीं सदी की सबसे प्रभावशाली प्रौद्योगिकियों में से एक बन चुकी है।
एसएआईपीआर के अध्यक्ष. पंड्या ने कहा, ‘आज जब विश्व अनिश्चितता के भंवर में फंसा हुआ है, जहां एक ओर जलवायु परिवर्तन, आर्थिक अस्थिरता और सामाजिक विभाजन जैसी चुनौतियां हमारे सामने खड़ी हैं, वहीं दूसरी ओर कृत्रिम मेधा (एआई) का तीव्र विकास मानव इतिहास के एक निर्णायक मोड़ का संकेत दे रहा है।’
उन्होंने कहा कि ऐसे समय में मानवता का भविष्य हमारी प्रत्येक चर्चा, प्रत्येक निर्णय और प्रत्येक नीति के केंद्र में होना अनिवार्य है।
डॉ. पंड्या ने कहा कि इस एआई शिखर सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ यदि कोई है, तो वह है ‘विश्वास’ है। विश्वास केवल प्रौद्योगिकी पर नहीं, बल्कि उस मानव विवेक पर केन्द्रित है, जो उसे दिशा देता है।
युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्यश्री द्वारा दिये गये सूत्र को याद करते हुए प्रतिकुलपति ने कहा कि जब मानवता पर संकट के बादल छा जाते हैं, तब उद्धार की राह भी उसी के भीतर से निकलती है, क्योंकि विनाश का कारण चाहे मनुष्य बने, पर सृजन और पुनर्निर्माण की क्षमता भी उसी में निहित है।
उन्होंने कहा कि मानवता ही वह शक्ति है जो स्वयं को संभालकर संसार को फिर से प्रकाश की ओर ले जा सकती है।
वैदिक ग्रंथ के प्रसिद्ध श्लोक का उल्लेख करते हुए डॉ पंड्या ने कहा, ‘‘अक्सर कहा जाता है कि जब संपूर्ण मानवता पर कोई संकट गहराता है, तब उस संकट से उबरने की शक्ति भी मानवता के भीतर ही जागृत होती है। हमारी प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा, विशेषकर संस्कृत की कालजयी भावना हमें यही सिखाती है कि मनुष्य की सामूहिक चेतना और सहअस्तित्व की भावना उसे हर विनाशकारी परिस्थिति से ऊपर उठाने में सक्षम बनाती है।’’
भाषा योगेश अजय
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