वाहन मालिकों को कम एथनॉल मिश्रित पेट्रोल का विकल्प मिले: नागेश्वरन

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वाहन मालिकों को कम एथनॉल मिश्रित पेट्रोल का विकल्प मिले: नागेश्वरन

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  • Publish Date - August 17, 2026 / 07:03 PM IST,
    Updated On - August 17, 2026 / 07:03 PM IST

नयी दिल्ली, 17 अगस्त (भाषा) मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने सरकार को पुराने वाहन मालिकों की चिंताओं को देखते हुए कम एथनॉल मिश्रित पेट्रोल का विकल्प फिर से उपलब्ध कराने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि इससे देश में बड़ी संख्या में मौजूद पुराने वाहनों को सुरक्षा मिल सकेगी और साथ ही एथनॉल मिश्रण कार्यक्रम भी जारी रखा जा सकता है।

सरकार ने पिछले साल 20 प्रतिशत एथनॉल मिश्रित पेट्रोल (ई20) की शुरुआत की थी। एक अप्रैल से देशभर के पेट्रोल पंप पर बिक्री के लिए यही पेट्रोल उपलब्ध है। इसका उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, घरेलू कृषि क्षेत्र को समर्थन देना और प्रदूषण घटाना है।

हालांकि, कुछ वाहन मालिकों, खासकर पुराने बीएस-6 से पहले के वाहनों के उपयोगकर्ताओं ने ई20 पेट्रोल के कारण वाहन के प्रदर्शन में कमी और कलपुर्जों को नुकसान पहुंचने की शिकायत की है। सरकार इन दावों को खारिज करती रही है। पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना है कि अलग-अलग प्रकार के पेट्रोल की आपूर्ति के लिए अलग बुनियादी ढांचा तैयार करना और उसे बनाए रखना व्यावहारिक नहीं है।

मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) नागेश्वरन और आर्थिक मामलों के विभाग में सलाहकार आकाश पुजारी ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित एक लेख में कहा कि उपलब्ध प्रमाण इस व्यापक दावे का समर्थन नहीं करते कि ई20 पेट्रोल से सभी वाहन के इंजन खराब हो रहे हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि भारत में बड़ी संख्या में मौजूद पुराने दोपहिया वाहनों के लिए यह नीति चुनौती पैदा कर सकती है।

उन्होंने कहा कि शिकायतों को पूरी तरह खारिज करना ‘गलती होगी, क्योंकि इनके पीछे एक वास्तविक समस्या और बड़ा सवाल छिपा है।’

लेख में कहा गया कि भारत में करीब 7.5 से आठ करोड़ पुराने दोपहिया वाहन हैं, जो बीएस-4 से पहले के हैं और ‘कार्ब्यूरेटर ’(इंजन का वह भाग जो पेट्रोल और हवा को मिश्रित करता है) तकनीक पर चलते हैं। कार्ब्यूरेटर एथनॉल मिश्रण में मौजूद अतिरिक्त ऑक्सीजन को पहचानकर ईंधन की मात्रा को स्वत: समायोजित नहीं कर सकता। इसके कारण ई20 पेट्रोल पर इंजन में हवा की तुलना में कम ईंधन पहुंच सकता है और इंजन अधिक गर्म हो सकता है।

दोनों ने यह भी कहा कि पुराने वाहनों में इस्तेमाल होने वाली रबड़ सील एथनॉल के अनुकूल नहीं होती हैं। ऐसे में ईंधन के संपर्क में आने पर खराब हो सकती हैं।

उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को ई20 के साथ-साथ ई10 जैसे कम एथनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल की उपलब्धता फिर से शुरू करनी चाहिए। इससे पुराने वाहनों की सुरक्षा होगी और सरकार का एथनॉल कार्यक्रम भी जारी रह सकेगा।

लेख में कहा गया कि सरकार को नए बदलावों के साथ आगे बढ़ने से पहले ‘मौजूदा वाहन बेड़े की सुरक्षा तबतक करनी चाहिए, जब तक कि उन्हें नए मानकों के अनुरूप बनाने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती।’’

एथनॉल में पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा कम होती है। ऐसे में ई20 से एक लीटर ईंधन में वाहन की दूरी कुछ कम हो सकती है। इसका वास्तविक प्रभाव करीब छह से सात प्रतिशत तक है, जबकि इंटरनेट पर कई बार इससे अधिक नुकसान के दावे किए जाते हैं।

उन्होंने कहा कि अमेरिका और भारत में हुए परीक्षणों में ई20 के अनुकूल वाहनों में इंजन के अधिक घिसने के प्रमाण नहीं मिले हैं। लेकिन पुराने ‘कार्ब्यूरेटर’ वाले दोपहिया वाहनों में ईंधन प्रणाली को उच्च एथनॉल मिश्रण के लिए तैयार नहीं किया गया था, इसलिए उन्हें अलग तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

लेखकों के अनुसार, इन वाहनों में एथनॉल अनुकूल कलपुर्जे लगाना ज्यादा महंगा काम नहीं होगा, लेकिन देश के पुराने वाहन बेड़े में यह बदलाव पूरा करने में कई वर्ष लग सकते हैं।

उन्होंने ई20 से आगे एथनॉल मिश्रण बढ़ाने को लेकर भी सावधानी बरतने की सलाह दी। इससे ईंधन उत्पादन और खाद्यान्न फसलों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।

लेख में कहा गया कि भारत के एथनॉल उत्पादन में मक्के की हिस्सेदारी करीब आधी है, जबकि अनाज आधारित स्रोतों की कुल हिस्सेदारी लगभग 67 प्रतिशत है। मक्का के लिए जमीन की मांग बढ़ने से सोयाबीन, मूंगफली और सरसों जैसी तिलहन फसलों पर असर पड़ सकता है, जबकि भारत पहले ही खाद्य तेलों के आयात पर निर्भर है।

लेखकों ने पानी के इस्तेमाल को लेकर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि नीति-निर्माताओं को केवल कुल अनुमानों (जिनमें बारिश का पानी भी शामिल होता है) पर ध्यान देने के बजाय नदियों, नहरों और जमीन के नीचे से निकाले गए पानी के इस्तेमाल पर ध्यान देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि ई20 से अधिक एथनॉल मिश्रण के जलवायु लाभ भी स्पष्ट नहीं हैं, क्योंकि अलग-अलग अध्ययनों में अनाज आधारित एथनॉल उत्पादन में खेती और प्रसंस्करण को शामिल करने के बाद उत्सर्जन प्रभाव को लेकर अलग-अलग निष्कर्ष सामने आए हैं।

हालांकि, लेखकों ने एथनॉल कार्यक्रम के लाभ को भी स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि इस योजना से गन्ना किसानों का बकाया कम करने, ग्रामीण आय बढ़ाने और उत्पादकों को निश्चित बाजार उपलब्ध कराने में मदद मिली है।

नागेश्वरन और पुजारी ने कहा कि सरकार को ऐसे कदमों को प्राथमिकता देनी चाहिए जिन्हें जरूरत पड़ने पर आसानी से बदला जा सके। इसमें खरीद मूल्य, पानी के इस्तेमाल से जुड़े नियम और कम एथनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल की उपलब्धता आदि शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि एथनॉल से जुड़े विवाद का असली मुद्दा केवल इंजन नहीं है, बल्कि यह तय करना है कि देश में कौन-सी फसलें उगाई जाएं और किन विकल्पों को भविष्य में वापस बदलना मुश्किल होगा।

लेखकों ने सुझाव दिया कि सरकार को ई10 जैसे कम मिश्रण वाले पेट्रोल का विकल्प फिर से शुरू करना चाहिए, मक्का को बढ़ावा देने वाली कीमत और जल उपयोग नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए, खाद्य तेल आयात शुल्क पर पुनर्विचार करना चाहिए और खाद्य बनाम ईंधन के संतुलन का पूरा आकलन होने तक एथनॉल मिश्रण को ई20 तक सीमित रखना चाहिए।

भाषा रमण अजय

अजय