छत्तीसगढ़: ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026’ पारित, कठोर सजा का किया गया प्रावधान

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छत्तीसगढ़: ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026’ पारित, कठोर सजा का किया गया प्रावधान

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  • Publish Date - March 19, 2026 / 08:49 PM IST,
    Updated On - March 19, 2026 / 08:49 PM IST

रायपुर, 19 मार्च (भाषा) छत्तीसगढ़ सरकार ने बृहस्पतिवार को विधानसभा में ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026’ पारित कर दिया।

इस विधेयक में जबरदस्ती, प्रलोभन, धोखाधड़ी या गलत जानकारी देकर धर्म परिवर्तन कराने और सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है।

उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने सदन में यह विधेयक प्रस्तुत किया।

शर्मा के पास गृह विभाग भी है।

विधेयक में अवैध धर्मांतरण कराने वालों के लिए सख्त सजा का प्रावधान किया गया है।

इस विधेयक के तहत सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान किया गया है जबकि नाबालिगों, महिलाओं, मानसिक रूप से कमजोर लोगों और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़े मामलों में में 20 वर्ष तक की कैद का प्रावधान है।

सदन में कांग्रेस सदस्यों की अनुपस्थिति में विधेयक पर चर्चा जारी रही।

उपमुख्यमंत्री ने जब विधेयक पेश करने की अनुमति मांगी, तब कांग्रेस सदस्यों ने इसे प्रवर समिति को भेजने की मांग की।

विधानसभा अध्यक्ष द्वारा यह मांग खारिज किए जाने पर कांग्रेस सदस्यों ने सदन की कार्यवाही का बहिष्कार कर दिया।

शर्मा ने इस बीच आरोप लगाया कि विपक्ष ने बहस से इसलिए किनारा कर लिया, क्योंकि इससे उनके ‘वोट बैंक’ को नुकसान पहुंच सकता है।

उन्होंने कहा, “विपक्ष केवल वोट बैंक की राजनीति करता है और यही वजह है कि वे सदन से नदारद हैं।”

उपमुख्यमंत्री ने कहा कि मौजूदा कानूनी प्रावधानों को मजबूत करने और उन्हें आज के समय के हिसाब से अद्यतन करने की जरूरत है।

शर्मा ने बस्तर संभाग के नारायणपुर और कांकेर जिलों में कथित धर्म परिवर्तन की घटनाओं से जुड़े विवादों का जिक्र करते हुए कहा कि इस विधेयक को मौजूदा हालात को ध्यान में रखते हुए ही पारित किया गया है।

उन्होंने यह भी साफ किया कि सरकार का उद्देश्य अपनी मर्जी से किए जाने वाले धर्म परिवर्तनों पर किसी भी तरह की रोक लगाना नहीं है।

उपमुख्यमंत्री ने कहा, “कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से धर्म परिवर्तन करने का फैसला कर सकता है। हम भला उसे कैसे रोक सकते हैं? मुद्दा यह है कि क्या धर्मांतरण किसी प्रलोभन, जबरदस्ती या गलत जानकारी के जरिए हो रहा है।”

शर्मा ने मौजूदा 1968 के कानून का जिक्र करते हुए कहा, “इसे कांग्रेस शासन के दौरान (तत्कालीन मध्यप्रदेश में) बनाया गया था। यह (नया विधेयक) उसी कानून का विस्तार और उसे मजबूत बनाने की एक पहल है। लगभग 60 साल बीत चुके हैं और हालात बदल गए हैं। यह हैरानी की बात है कि विपक्ष उस कानून का विरोध करते हुए सदन से बाहर जा रहा है, जिसे उन्होंने खुद बनाया था।”

उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह राज्य की संस्कृति पर धर्मांतरण के संभावित असर को नजरअंदाज कर रही है।

शर्मा ने आरोप लगाया, “कांग्रेस को सिर्फ वोट बैंक की राजनीति की चिंता है, समाज या देश की नहीं।”

मंत्री ने यह भी कहा कि राज्य सरकार ने अवैध घुसपैठ से निपटने के लिए कदम उठाए हैं, जिसमें हर जिले में कार्य बल का गठन और ‘होल्डिंग सेंटर’ स्थापित करना शामिल है।

उन्होंने दावा किया कि अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान करने और उन्हें वापस भेजने के लिए कार्रवाई की गई है।

प्रस्तावित कानून मौजूदा ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 1968’ का स्थान लेगा, जिसे राज्य गठन के समय मध्यप्रदेश से अपनाया गया था।

सरकार का कहना है कि वर्तमान अधिनियम में केवल धर्मांतरण के बाद जिला मजिस्ट्रेट को सूचना देने का प्रावधान है और जबरन धर्मांतरण को संज्ञेय एवं जमानती अपराध माना गया है, जिसमें अपेक्षाकृत हल्का दंड निर्धारित है।

विधेयक के उद्देश्य और कारणों के बारे में बताया गया कि राज्य की भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों व प्रौद्योगिकी एवं संचार के साधनों के विस्तार के चलते बल, प्रलोभन और कपटपूर्ण तरीकों से धर्मांतरण को प्रभावी ढंग से रोकने के लिए मौजूदा कानून अपर्याप्त हो गया है इसलिए एक व्यापक और कठोर कानून आवश्यक है।

नए विधेयक में बल, जबरदस्ती, अनुचित प्रभाव, प्रलोभन, गलत बयानी, कपटपूर्ण साधनों या विवाह के माध्यम से किए गए अवैध धर्मांतरण को प्रतिबंधित किया गया है।

‍विधेयक में सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से किए गए धर्मांतरण भी शामिल हैं।

प्रस्तावित कानून के तहत सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होंगे।

विधेयक के अनुसार, अपने धर्म में वापस लौटना धर्मांतरण नहीं माना जाएगा।

पारित किये गये विधेयक के तहत, ‘प्रलोभन’ में धन, उपहार, रोजगार, मुफ्त शिक्षा या चिकित्सा सुविधा, बेहतर जीवनशैली का वादा या विवाह शामिल हैं जबकि ‘प्रताड़ना’ में मानसिक दबाव, शारीरिक बल या धमकी को शामिल किया गया है।

‘सामूहिक धर्मांतरण’ को दो या उससे अधिक व्यक्तियों के एक ही आयोजन में धर्म परिवर्तन के रूप में परिभाषित किया गया है।

प्रस्तावित कानून के तहत धर्मांतरण की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को सक्षम प्राधिकारी, अर्थात जिला मजिस्ट्रेट या उनके द्वारा अधिकृत अधिकारी को पूर्व सूचना देनी होगी।

संबंधित धार्मिक पदाधिकारी को भी अग्रिम सूचना देना अनिवार्य होगा।

प्रस्तावित धर्मांतरण का विवरण सात दिनों के भीतर सार्वजनिक किया जाएगा और 30 दिनों के भीतर आपत्तियां दर्ज की जा सकेंगी, जिनकी जांच के बाद आदेश पारित किया जाएगा।

विधेयक में उल्लंघन के लिए न्यूनतम सात वर्ष की सजा, जिसे 10 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है और कम से कम पांच लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है।

गंभीर मामलों में 10 से 20 वर्ष की कैद और 10 लाख रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है।

सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास और 25 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है।

विधेयक में पीड़ितों को 10 लाख रुपये तक मुआवजा देने और मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित करने का प्रावधान भी किया गया है।

सरकार ने कहा कि ऐसे मामलों का निपटारा यथासंभव छह माह के भीतर किया जाएगा।

भाषा संजीव जितेंद्र

जितेंद्र