Reported By: Rajesh Raj
,रायपुरः Deepasha Buffalo Controversy छत्तीसगढ़ में क्लोनिंग से जन्मी वनभैंसा दीपआशा को लेकर बड़ी खबर है। दीपआशा वनभैंसा है या नहीं यह बात इसे जन्म देने वाली करनाल की संस्थान NDRI भी नहीं बता पाई। NDRI करनाल को इसी साल जनवरी में छत्तीसगढ़ के वन विभाग की ओर से पत्र लिखा गया था और पूछा गया था कि दीपआशा वनभैंसा है या नहीं? यह भी बताए कि दीपआशा के जन्म के बाद उसका कोई डीएनए टेस्ट हुआ था? इसे अलावा कई और सवाल भी पूछे गए थे।
Deepasha Buffalo Controversy हैरानी की बात तो यह है कि इन सारे सवालों का NDRI करनाल ने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी जगह दीपआशा का जन्म का प्रोसेस और तकनीक की जानकारी दी गई है। NDRI ने उसकी 2016 की कॉपी लगाकर भेज दिया। NDRI करनाल के इस जवाब से यह संदेह और गहरा गया है कि दीपआशा वनभैंसा नहीं हैं। दीपआशा का जन्म 2014 में हुआ और 2018 से इसे छिपाकर रखा जा रहा है, क्योंकि यह देखने में ही वनभैंसा की जगह मुर्रा भैंस की तरह दिख रही है।
दरअसल, वन विभाग ने 11 साल पहले दुनिया की पहली वनभैंसा का क्लोन पैदा का निर्णय लिया। उसके बाद उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व की वन भैंस आशा के सीमेटिक सेल कल्चर और दिल्ली के बूचड़खाने की देसी भैंस के अंडाशय से क्लोन की तकनीकी से दिसंबर 2014 को नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टिट्यूट करनाल में क्लोन पैदा हुआ। करनाल से 28 अगस्त 2018 को दीपआशा जंगल सफारी नवा रायपुर लाई गई। उसे यहां लाने के बाद से ही जंगली होने पर सवाल उठाए जा रहे हैं। वनभैंस की प्रमुख पहचान उसके सींग होती है। दीपआशा की सींग ही छोटे हैं। हैरानी की बात है कि दीपआशा को लाने दो विशेषज्ञों डा. जयकिशोर जडिया और वीके चंदन को करनाल भेजा गया था।
प्रदेश में लगातार कम होती वन भैंसों की संख्या को देखते हुए साल 2001 में इसे राजकीय पशु घोषित किया गया। उस समय प्रदेश में वनभैंसों की संख्या करीब 80 थी, लेकिन घटत-घटते सिमटती चली गई। 20वीं सदी के शुरुआत में वन भैंसा की प्रजाति अमरकंटक से लेकर बस्तर तक में बहुत अधिक संख्या में पाई जाती थी। वर्तमान में वनभैंसा प्रमुखत: दंतेवाड़ा जिले के इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान और उदंती अभारण्य में ही रह गया है।
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