देवेंद्र कुमार मिश्रा, धमतरीः Dhamtari News: आपने इंसानी अदालतों के बारे में बहुत सुना होगा, लेकिन क्या आपको पता है कि छत्तीसगढ़ में एक ऐसी जगह भी है, जहां आम इंसान नहीं बल्कि देवी-देवता कटघरे में खड़े होते हैं। इसके लिए बकायदा कटघरा सजता है, आरोप लगते हैं, सुनवाई होती है और फैसला भी सुनाया जाता है। यह अनोखा दरबार सिहावा क्षेत्र के बोराई जंगल में भंगाराव माई की अदालत के नाम से जाना जाता है।
Dhamtari News: दरअसल, धमतरी का सिहावा इलाका घने जंगलों, पहाड़ों और आदिवासी संस्कृति से घिरा हुआ है। यहां कई पुरानी पंरपराएं आज भी जिवित है। हर साल भादो महीने की शुरुआत में कुर्सीघाट-बोराई मार्ग पर जंगल के बीच भंगाराव माई का दरबार सजता है। इस दौरान दूर-दूर से देवी-देवताओं के प्रतीक यहां पहुंचते हैं। सिहावा राज, बस्तर और ओडिशा क्षेत्र से जुड़े देवी-देवताओं की मौजूद रहते हैं। स्थानीय मान्यता के मुताबिक, यदि कोई देवी-देवता अपनी जिम्मेदारी में चूक करते हैं या उनसे कोई गलती होती है तो मामला भंगाराव माई के दरबार में लाया जाता है। यहां संबंधित देवी-देवता के प्रतीक के सामने मामले की सुनवाई होती है। जरूरत पड़ने पर कुछ देवी-देवताओं को प्रतीकात्मक रूप से हिरासत में लेने की परंपरा भी निभाई जाती है। मान्यता है कि भंगाराव माई की अनुमति के बिना देव-सीमा में कोई भी देवी-देवता अपना कार्य नहीं कर सकते। यही वजह है कि इस जात्रा में शामिल होने वाले देवी-देवताओं के लिए भंगाराव माई का दरबार विशेष महत्व रखता है।
इस अनोखे आयोजन में केवल देवी-देवताओं के प्रतीक ही नहीं पहुंचते, बल्कि बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी शामिल होते हैं। स्थानीय आदिवासी समाज के लिए यह महज धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और पहचान का हिस्सा है। इंसानी अदालतों से अलग यह देव-अदालत बताती है कि यहां न्याय की अवधारणा केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है। देवी-देवताओं को भी जिम्मेदारी से जोड़ने वाली यह अनोखी परंपरा आज भी बोराई के जंगल में उसी आस्था के साथ कायम है।
सदियों पुरानी इस परंपरा को लेकर कलेक्टर अबिनाश मिश्रा ने कहा कि भंगाराव माई की ये परंपरा सिर्फ धमतरी की नहीं, बल्कि धमतरी के साथ बस्तर और ओडिशा की साझा सांस्कृतिक विरासत है। इतने बड़े आयोजन को सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से पूरा कराने के लिए हर स्तर पर सहयोग किया जाएगा।।