जंगल वॉरफेयर कॉलेज में सुरक्षाबलों की बारूदी सुरंग रोधी क्षमताओं को मजबूत करेंगे आत्मसमर्पित नक्सली

Ads

जंगल वॉरफेयर कॉलेज में सुरक्षाबलों की बारूदी सुरंग रोधी क्षमताओं को मजबूत करेंगे आत्मसमर्पित नक्सली

  •  
  • Publish Date - April 9, 2026 / 12:47 PM IST,
    Updated On - April 9, 2026 / 12:47 PM IST

रायपुर, नौ अप्रैल (भाषा) छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खात्मे की घोषणा के बाद अब पुलिस ने क्षेत्र में बिछाई गई बारूदी सुरंगों को हटाने के लिए उन आत्मसमर्पित नक्सलियों से प्रशिक्षण लेने का फैसला किया है जिन्हें बारूदी सुरंग बनाने और लगाने में महारत हासिल है।

पिछले चार दशकों से अधिक समय से वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) की समस्या से जूझ रहे छत्तीसगढ़ को 31 मार्च को सशस्त्र माओवादियों से मुक्त घोषित कर दिया गया।

अधिकारियों ने बताया कि पूर्व माओवादियों से मिली जानकारी राज्य के बस्तर तथा उन इलाकों को अधिक सुरक्षित बनाने में अहम भूमिका निभाएगी जहां अभी भी कई बारूदी सुरंग और प्रेशर बम लगे हुए हैं।

न्होंने बताया कि इससे सुरक्षा बलों की बारूदी सुरंग के खतरों का पता लगाने और उन्हें बेअसर करने की क्षमता मजबूत होगी। इस तरह, यह सुरक्षाकर्मियों और स्थानीय समुदायों, दोनों को उन विस्फोटकों के खतरों से बचाएगा जिन्हें माओवादियों ने अपने प्रभाव और गतिविधियों के चरम पर इस पूरे इलाके में बड़े पैमाने पर लगाया था।

बस्तर क्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पट्टिलिंगम ने बताया कि ऐसे लगभग 20 पूर्व माओवादियों की पहचान की गई है, जिनमें से कई को बारूदी सुरंग बनाने और लगाने का पहले से अनुभव है। यह पूर्व माओवादी अब कांकेर जिले में काउंटर टेररिज्म एंड जंगल वॉरफेयर (सीटीजेडब्ल्यू) कॉलेज में प्रशिक्षण कार्यक्रमों में मदद करेंगे।

सुंदरराज ने बताया कि उनकी भूमिका इस बारे में व्यावहारिक और जमीनी स्तर की जानकारी साझा करने पर केंद्रित होगी कि घने जंगलों वाले इलाकों में बारूदी सुरंगों को कैसे जोड़ा जाता है, कैसे छिपाया जाता है और कैसे ट्रिगर किया जाता है।

उन्होंने बताया कि इस पहल का मकसद सुरक्षा बलों की अभियान क्षमताओं को बढ़ाना है, साथ ही नागरिकों की सुरक्षा को भी प्राथमिकता देना है।

पुलिस अधिकारी ने कहा, ”इस प्रयास का मकसद आत्मसमर्पण किए हुए माओवादियों की जानकारी का इस्तेमाल करके बारूदी सुरंगों को बेहतर ढंग से बेअसर करके इलाके को इस खतरे से मुक्त करना है।”

उन्होंने बताया कि चुने गए कई लोगों ने माओवादी संगठनों के भीतर सुरक्षाबलों के खिलाफ अभियान में भूमिका निभाई थी। उन्हें बारूदी सुरंगों को बनाने और लगाने के बारे में जानकारी है।

सुंदरराज ने बताया कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम न केवल बारूदी सुरंगों का पता लगाने और उन्हें बेअसर करने की क्षमताओं को मजबूत करने के लिए बनाया गया है, बल्कि उन दूरदराज और जंगली इलाकों में जोखिमों को कम करने के लिए भी है, जहां अक्सर बारूदी सुरंग लगाए जाते रहे हैं। इससे वहां रहने वाली आबादी के जीवन और संपत्ति की रक्षा की जा सकेगी।

उन्होंने कहा कि यह पहल एक व्यापक पुनर्वास रणनीति को भी दर्शाती है, जो पूर्व माओवादियों को लोगों की सुरक्षा में योगदान देने वाले के रूप में बदल रही है।

पुलिस अधिकारी ने कहा कि उनके ज्ञान को औपचारिक प्रशिक्षण प्रणालियों में शामिल करके, अधिकारी न केवल बचे हुए खतरों को बेअसर करने का लक्ष्य रख रहे हैं, बल्कि पूर्व माओवादियों को मुख्यधारा के समाज में फिर से जोड़ने में भी मदद कर रहे हैं।

नक्सल विरोधी अभियानों में लगे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि बारूदी सुरंग को अक्सर जमीन के नीचे या झाड़ियों में छिपाकर रखा जाता है। ये सुरंगें बस्तर क्षेत्र में नक्सल विरोधी अभियानों में लगे सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ा खतरा रही हैं।

पिछले वर्षों में बारूदी सुरंगों की वजह से बड़ी संख्या में जानें गई हैं। नाम न बताने की शर्त पर उन्होंने कहा कि पहले तो एंटी-लैंडमाइन गाड़ियों को भी निशाना बनाया जा चुका है।

2001 से मार्च 2026 के बीच, सुरक्षा बलों ने बस्तर संभाग के सात जिलों में कम से कम 4,607 बारूदी सुरंग बरामद किए। इस संभाग में सात जिले —बस्तर, कांकेर, कोंडागांव, नारायणपुर, दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर शामिल है जो लगभग 40 हजार वर्ग किलोमीटर के इलाके में फैले हुए हैं।

उन्होंने बताया कि इसी दौरान बारूदी सुरंग विस्फोटों की 1,280 घटनाएं हुई, जिनमें आम नागरिकों और सुरक्षा कर्मियों, दोनों की बड़ी संख्या में जानें गईं।

अधिकारियों ने कहा कि बेहतर पहचान तकनीकों और खोजी कुत्तों तथा प्रशिक्षित दस्तों की मदद से चलाए जाने वाले नियमित बरामदगी अभियानों के बावजूद, चुनौतियां बनी हुई हैं।

उन्होंने कहा, ”चूंकि अब यह इलाका हथियारबंद माओवादियों से मुक्त हो चुका है, इसलिए आत्मसमर्पण कर चुके माओवादियों की मदद से सुरक्षा बल उन बारूदी सुरंग का पता लगा सकेंगे और उन्हें निष्क्रिय कर सकेंगे, जिन्हें पहले नक्सलियों ने लगाया था। इससे जंगल और भी सुरक्षित हो जाएंगे।”

भाषा संजीव मनीषा

मनीषा