रायपुरः दलों के भीतर मौजूद दागियों से दागी यानि वो नेता जिनपर गंभीर धाराओं में केस दर्ज हुआ, जिनपर आरोप लगे, गिरफ्तारी हुई, जेल गए और ऐसे दागी नेता इधर भी हैं और उधर भी हैं, लेकिन सवाल उठ रहा है कि क्या ऐसे नेता फिर से अगले चुनावी मौसम में पार्टियों के साथ होंगे। मारपीट, अभद्रता से आगे गंभीर आरोप वाले नेताओं को साथ रखना क्या दलों की सियासी मजबूरी है?
छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों से सामने आए कुछ आपराधिक मामलों से सियासी गलियारों में सवाल की हलचल बढ़ा दी है। अंबिकापुर जिले के दरिमा में BJP ST मोर्चा मंडल अध्यक्ष जितेंद्र कुजूर पर पटवारी से मारपीट का आरोप लगा। वीडियो वायरल हुआ। पटवारी संघ के विरोध के बाद आरोपी की गिरफ्तारी भी हुई, सुकमा जिले के कोंटा में BJP युवा मोर्चा मंडल अध्यक्ष पवन कुमार सिद्धू पर तहसील कार्यालय में महिला कर्मचारी से गाली-गलौज और हंगामे का आरोप लगा, FIR दर्ज की गई, जबकि कवर्धा में किसान कांग्रेस के जिलाध्यक्ष रवि चंद्रवंशी को पुलिस ने एक युवती ने यौन शोषण का गंभीर आरोप में गिरफ्तार किया। रायपुर के बीरगांव नगर निगम में कांग्रेस पार्षद ओम प्रकाश साहू भी 50 लाख रु. गबन मामले में आरोपी हैं। पुलिस ने जेल भेजा तो पार्टी ने उन्हें निलंबित भी कर दिया। ये तो बस चंद ताजा घटनाएं हैं, जिसे लेकर पक्ष-विपक्ष एक दूसरे पर ब्लेम लगाकर अपने पक्ष के नेताओं पर कार्रवाई करने की दलीलें देते नजर आते हैं।
हाल के दिनों में देश में कई ऐसे मामले हैं जिनमें आपराधिक मामलों में सजा के ऐलान के साथ ही जनप्रतिनियों को अपनी विधायकी या पद खोने पड़े हों। ऐसे में ये तो साफ है कि पार्टियों का ऐसे नेताओं पर एक्शन लेने का दावा काफी नहीं है। दलों के भीतर ईमानदारी से ऐसे नेताओं की सफाई का, जवाबदेही तय कर करने की जरूरत है। सवाल ये कि क्या दल पूरे दम से इसके लिए तैयार हैं?