तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ की पंडवानी लोक कला को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई

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तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ की पंडवानी लोक कला को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई

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  • Publish Date - July 5, 2026 / 05:53 PM IST,
    Updated On - July 5, 2026 / 05:53 PM IST

(टीकेश्वर पटेल)

रायपुर, पांच जुलाई (भाषा) छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के एक गांव में 1960 के दशक के अंत में जब 13 साल की तीजन बाई ने एक अस्थायी मंच पर महाभारत की कथाएं सुनाईं, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि आदिवासी समुदाय की यह लड़की, जिसे कभी सबके सामने गाने-बजाने की वजह से समाज से अलग-थलग कर दिया गया था, एक दिन राज्य की पारंपरिक लोककथा गायन शैली ‘पंडवानी’ को पूरी दुनिया में पहचान दिलाएगी।

मंच पर तंबूरे के साथ शानदार प्रस्तुति देने के लिए विख्यात तीजन बाई ने लोककथा कहने की कला को रंगमंच का रूप दे दिया। उनकी दमदार आवाज, शानदार हाव-भाव और प्रभावी उपस्थिति ने महाभारत के हर किरदार में जान डाल दी।

मशहूर पंडवानी कलाकार तीजन बाई का लंबी बीमारी के बाद रविवार को रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में निधन हो गया। वह 70 साल की थीं।

तीजन बाई अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ गई हैं, जिसने एक प्राचीन लोककथा गायन शैली (पंडवानी) को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर लोककला में तब्दील कर दिया।

‘पंडवानी’ यानी “पांडवों की आवाज” महाभारत के किस्सों को नाटकीय शैली, गायन और वाद्य संगीत के साथ प्रस्तुत करने वाली एक विशिष्ट लोककला है।

दुर्ग के गनियारी गांव में 1956 में एक गरीब पारधी आदिवासी परिवार में जन्म से लेकर दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक मंचों तक दमदार प्रस्तुति का तीजन बाई का सफर असाधारण दृढ़ता, मजबूत हौसले और कलात्मक उत्कृष्टता का प्रतीक है।

तीजन बाई बचपन से ही अपने नाना बृजलाल को महाभारत के किस्से सुनाते हुए देखती आई थीं। वह उनकी प्रस्तुतियां देखते हुए इस महाकाव्य के किस्से याद करने लगीं।

लेखक धर्मेंद्र निर्मल ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि एक ऐसे दौर में जब महिलाओं को ‘पंडवानी’ की प्रस्तुति देने से हतोत्साहित किया जाता था और अगर कोई महिला इस पारंपरिक लोककथा गायन शैली की प्रस्तुति देने का फैसला करती भी थी, तो वह शांत ‘वेदमती’ शैली में बैठकर गाती थी, तीजन बाई ने नाटकीय ‘कापालिक’ शैली को चुना, जो पारंपरिक रूप से पुरुषों के लिए निर्धारित थी।

निर्मल (51) ने छत्तीसगढ़ी भाषा में तीजन बाई की जीवनी ‘तीजन गाथा’ लिखी है, जिसका विमोचन पिछले साल हुआ था।

उन्होंने बताया कि तीजन बाई को बचपन में अपने परिवार और समुदाय के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था।

निर्मल के मुताबिक, तीजन बाई की शादी बचपन में ही हो गई थी और जब वह 12 साल की हुईं और उनके ससुरालवाले ‘गौने’ की रस्म के लिए आए, तो उन्होंने ‘पंडवानी’ गायन छोड़ने की शर्त मानने से इनकार कर दिया, जिससे उनका रिश्ता टूट गया।

उन्होंने बताया कि आखिरकार तीजन बाई को समाज से बहिष्कृत कर दिया गया और उन्हें घर छोड़ने के लिए भी मजबूर होना पड़ा।

निर्मल के अनुसार, एक झोपड़ी में अकेले रहकर पड़ोसियों से मिलने वाली मदद से गुजारा करते हुए तीजन बाई ने ‘पंडवानी’ गायन जारी रखा।

उन्होंने बताया कि शुरू में तीजन बाई के नाना ने गनियारी में उन्हें एक छोटा मंच प्रदान किया, जिसके बाद पास के चंद्रखुरी गांव के देशमुख परिवार ने उन्हें गांव के चौक पर ‘पंडवानी’ प्रस्तुति देने के लिए बुलाया।

निर्मल ने बताया कि तीजन बाई के शो इतने लोकप्रिय हुए कि आसपास के गांवों से लोगों की भारी भीड़ उमड़ने के कारण इनका आयोजन तीन हफ्ते तक चला।

निर्मल के मुताबिक, बताया जाता है कि तीजन बाई का जन्म 1956 में तीज के पर्व पर हुआ था, इसलिए उनका नाम ‘तीजन’ पड़ा।

उन्होंने बताया कि तीजन बाई पारधी अनुसूचित जनजाति समुदाय से ताल्लुक रखती थीं, जिसे शिकार करने के अलावा झाड़ू और बांस की टोकरियां बनाने के लिए जाना जाता है।

निर्मल के अनुसार, तीजन बाई ने बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के संस्कृत महाभारत के सभी 18 पर्वों को महज 21 दिन में याद कर लिया।

उन्होंने बताया कि 18 साल की उम्र के आसपास तीजन बाई ने दूसरी शादी की, जिससे उनके तीन बेटे हुए।

निर्मल ने बताया कि तीजन बाई की दूसरी शादी भी परेशानियों भरी रही, क्योंकि उनके पति को शराब की लत थी और पीने के बाद वह उनके साथ कथित तौर पर बुरा बर्ताव करते थे।

उन्होंने बताया कि एक बार जब तीजन बाई प्रस्तुति दे रही थीं, तब उनके पति ने उनके साथ मारपीट की, जिसके बाद वह उनसे अलग हो गईं।

निर्मल के मुताबिक, बाद में तीजन बाई ने हारमोनियम वादक तुकाराम वर्मा से शादी कर ली, जो उनका पेशेवर कामकाज संभालते थे और उनके पूरे करियर के दौरान उनके साथ रहे।

निर्मल ने बताया कि तीजन बाई ने अपने तीनों बेटों को अकेले दम पर पाला। हालांकि, इनमें से दो अब इस दुनिया में नहीं हैं।

निर्मल के अनुसार, जाने-माने थिएटर कलाकार हबीब तनवीर ने तीजन बाई की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने प्रस्तुति देने का सुझाव दिया।

उन्होंने बताया कि इंदिरा के सामने प्रस्तुति ने तीजन बाई की जिंदगी बदल दी।

निर्मल ने बताया कि 1986 में तीजन बाई भिलाई स्टील प्लांट से जुड़ गईं, जहां उनकी प्रतिभा में और निखार आया।

उन्होंने बताया कि तीजन बाई ने भारत की सांस्कृतिक दूत के तौर पर दुनियाभर की यात्रा की और अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, इटली, जापान, रूस, ऑस्ट्रेलिया, तुर्किये, ट्यूनीशिया सहित कई देशों में प्रस्तुतियां दीं।

निर्मल ने कहा कि तीजन बाई ने जहां भी प्रस्तुति दी, छत्तीसगढ़ी भाषा से अनजान दर्शक भी उनकी लोककथा कहने की कला, अभिनय और संगीत से मंत्रमुग्ध हो गए।

उन्होंने बताया कि तीजन बाई जब भी विदेश यात्रा से लौटती थीं, तो संवाददाताओं से उस एक चीज के बारे में बात करती थीं, जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा याद आती थी और वह चीज छत्तीसगढ़ का लोकप्रिय व्यंजन ‘बासी’ है, जो बचे हुए चावल को रातभर पानी में भिगोकर बनाया जाता है।

निर्मल के मुताबिक, एक बार तीजन बाई ने एक आलीशान होटल के कर्मी से सादा चावल परोसने के लिए कहा, जिन्हें उन्होंने रातभर भिगोकर रखा और अगली सुबह ‘बासी’ बनाकर खाया।

उन्होंने बताया कि तीजन बाई मशहूर फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल की लोकप्रिय टीवी शृंखला ‘भारत एक खोज’ में भी दिखाई दी थीं, जिसमें उन्होंने करोड़ों दर्शकों को ‘पंडवानी’ से रूबरू कराया था।

तीजन बाई के दोस्तों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर होने के बावजूद वह गांव की परंपराओं से जुड़ी रहीं और उनकी जीवनशैली कभी नहीं बदली।

दोस्तों ने बताया कि तीजन बाई ने ‘पान’ प्रेम कभी नहीं छोड़ा, वह स्थानीय बोली में बात करती रहीं और ‘पंडवानी’ को जीवित रखने के लिए युवा कलाकारों का मार्गदर्शन जारी रखा।

निर्मल ने बताया कि ‘द्रौपदी चीरहरण’ उनकी पसंदीदा प्रस्तुतियों में से एक था, जिसके जरिये उन्होंने दर्शकों से महिलाओं के खिलाफ हिंसा और अन्याय के बारे में सोचने का आग्रह किया।

बाद में, कई विश्वविद्यालयों ने भारतीय संस्कृति में योगदान के लिए उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि से नवाजा।

तीजन बाई को पद्म श्री (1987), पद्म भूषण (2003) और पद्म विभूषण (2019) के साथ-साथ संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और कई अन्य सम्मान मिले।

विशेषज्ञों ने कहा कि तीजन बाई के निधन के साथ भारतीय लोक कलाओं के एक युग का अंत हो गया है।

भाषा पारुल नेत्रपाल

नेत्रपाल