रायपुरः Vishnu Ka Sushasan: छत्तीसगढ़ की राजनीति में विष्णु देव साय के नेतृत्व में बनी सरकार एक नए अध्याय की शुरुआत मानी जा रही है। एक आदिवासी नेता के रूप में साय का मुख्यमंत्री बनना न केवल राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी इसे एक बड़े बदलाव के तौर पर देखा गया। छत्तीसगढ़ लंबे समय से नक्सल समस्या से जूझता रहा है। खासकर बस्तर संभाग जैसे क्षेत्र वर्षों तक हिंसा, असुरक्षा और विकास की कमी के प्रतीक बने रहे। ऐसे में विष्णु देव साय के नेतृत्व में बनी सरकार ने नक्सल उन्मूलन को अपनी प्राथमिकताओं में प्रमुख स्थान दिया है। सरकार की रणनीति “सुरक्षा और विकास” के संतुलन पर आधारित है, जिसका असर अब जमीन पर दिखने लगा है। छत्तीसगढ़ अब नक्सलवाद के मुक्ति की राह में मंजिल तक पहुंच गया है।
दरअसल, भाजपा की डबल इंजन सरकार ने सशस्त्र नक्सलवाद को खत्म करने का संकल्प लिया है और इसके लिए 31 मार्च 2026 का समय निर्धारित किया है। केंद्र सरकार के समन्वय के साथ साय सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ सुरक्षा बलों की कार्रवाई को और तेज किया। आधुनिक तकनीक, बेहतर इंटेलिजेंस नेटवर्क और केंद्रीय बलों के समन्वय के जरिए ऑपरेशनों को अधिक प्रभावी बनाया। जंगलों के भीतर तक पहुंच बनाने के लिए नए कैंप स्थापित किए गए हैं, जिससे नक्सलियों के प्रभाव वाले इलाकों में सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ी है। साय सरकार की एक अहम पहल नक्सलियों के लिए आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति को मजबूत करना था, जो नक्सली मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं, उन्हें आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर दिए गए हैं। इससे कई नक्सली हथियार छोड़कर सामान्य जीवन की ओर लौटे हैं।
Vishnu Ka Sushasan: साय सरकार के प्रयासों से बीते 2 वर्षों में लगभग 3 हजार से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर पुनर्वास किया है, जिसमें सीसी मेंबर से लेकर विभिन्न स्तरों के कैडर शामिल हैं। इसके अतिरिक्त 2 हजार से अधिक नक्सलियों की गिरफ्तारी हुई है और लगभग 500 से अधिक नक्सली मुठभेड़ों में निष्प्रभावी (न्यूट्रलाइज) किए गए हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर 5000 से अधिक सशस्त्र कैडर में कमी आई है, जो नक्सल संगठन की रीढ़ को कमजोर करने वाला निर्णायक कारक सिद्ध हुआ है। वर्तमान स्थिति में DKSZC स्तर का कोई सक्रिय माओवादी छत्तीसगढ़ में शेष नहीं है। केवल 30 से 40 की सीमित संख्या में नक्सली उत्तर और दक्षिण के दूरस्थ क्षेत्रों में बचे हैं, जिनके भी शीघ्र पुनर्वास करने की संभावना व्यक्त की गई है। उन्होंने कहा कि यह परिवर्तन केवल सुरक्षा अभियानों का परिणाम नहीं, बल्कि विश्वास, संवाद और पुनर्वास नीति की सफलता का भी परिचायक है।
सरकार ने यह समझा है कि केवल सैन्य कार्रवाई से नक्सलवाद खत्म नहीं किया जा सकता। इसलिए सड़कों, पुलों, स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों का तेजी से निर्माण किया जा रहा है। दूरदराज के गांवों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कनेक्टिविटी पर विशेष ध्यान दिया गया है। बस्तर और आसपास के क्षेत्रों में शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाने के प्रयास भी किए जा रहे हैं, ताकि युवाओं को नक्सलवाद की ओर जाने से रोका जा सके। जनजातीय समुदायों के लिए विशेष योजनाएं भी लागू की गई हैं, जिसमें नीयद नेल्लानार जैसी योजना प्रमुख है।
सरकार की कोशिशों का एक सकारात्मक असर यह भी रहा है कि स्थानीय लोगों का भरोसा प्रशासन पर बढ़ रहा है। पहले जहां लोग डर के कारण चुप रहते थे, वहीं अब वे सुरक्षा बलों को जानकारी देने लगे हैं। इससे नक्सलियों के नेटवर्क को कमजोर करने में मदद मिल रही है।
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