महासमुंद। विधायकजी के रिपोर्ट कार्ड में आज बारी है छत्तीसगढ़ के खल्लारी विधानसभा सीट की। महासमुंद जिले में आने वाली इस सीट पर फिलहाल बीजेपी का कब्जा है और चुन्नीलाल साहू यहां से विधायक हैं। पहाड़ों पर विराजी मां खल्लारी के धाम में हमेशा ही भक्तों का तांता लगा होता है। यहां के नेता भी कहीं न कहीं मां का आशीर्वाद लेकर ही यहां सियासी जंग में उतरते हैं। आस्था का धाम होने के बाद भी ये इलाका अभी भी कई दुश्वारियों से जूझ रहा है।
खल्लारी में आने वाले चुनाव में सिंचाई सुविधाओं का अभाव सबसे बड़ा सियासी मुद्दा बनेगा। क्षेत्र में कोमा जलाशय, चांटी बांध जलाशय, धरमपुर बांध जैसी सिंचाई परियोजनाएं अधूरी है। जबकि कलमीझर डैम टूटने और ओडिशा में बने बांध पर पानी का अनुबंध होने के बाद भी यहां के किसानों को सिंचाई सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। वहीं क्षेत्र में उद्योग धंधों का अभाव होने की वजह से युवा बेरोजगार घूम रहे हैं। शिक्षा की बात की जाए तो खल्लारी में कॉलेज खोला गया है। लेकिन रोजगारपरक शिक्षा नहीं होने और परंपरागत संकायों में शिक्षकों का अभाव होने की वजह से शिक्षा का स्तर गिर रहा है। क्षेत्र के स्कूलों में 1272 शिक्षकों की जरूरत है जबकि 638 शिक्षकों के भरोसे काम चल रहा है। खल्लारी में पानी की कमी भी एक गंभीर समस्या है।
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बागबहरा नगर निगम इलाके में भी हालात ज्यादा बेहतर नहीं है। सड़कों में जहां गड्ढे ही गढ्ढे नजर आते हैं तो साफ सफाई का भी बुरा हाल है। ओडिशा की सीमा से लगा क्षेत्र होने की वजह से अवैध शराब बिक्री भी बड़ा मुद्दा है। क्षेत्र में अस्पताल तो खोले गए हैं लेकिन डॉक्टर्स की कमी के कारण छोटी–मोटी बीमारी के लिए भी ग्रामीणों को महासमुंद या रायपुर का रूख करना पड़ता है। बागबहरा बाईपास का मुद्दा भी स्थानीय कई वर्षों से उठ रहा है। ऐसे में विपक्ष भी इन मुद्दों को लेकर विधायक को घेरने की रणनीति बना रहा है। हालांकि विधायक के पास भी इन आरोपों के जवाब तैयार हैं।
इन मुद्दों के अलावा भी चुन्नी लाल साहू को चुनाव के दौरान मतदाताओं के कई सवालों के जवाब देने होंगे। महिला थाना नहीं होने से क्षेत्र में महिला सुरक्षा पर भी कई सवाल खड़े होते हैं। कुल मिलाकर खल्लारी में समस्याओँ की कोई कमी नहीं है। लेकिन बीजेपी और कांग्रेस इन दुश्वारियों के लिए एक–दूसरे को जिम्मेदार बताकर समस्याओं से पल्ला झाड़ लेते हैं।
खल्लारी विधानसभा क्षेत्र के सियासी समीकरण की बात की जाए तो यहां की जनता परिवर्तन पर यकीन करती है। मां खल्लारी के इस धाम में जनता ने कभी भी एक नेता के पैर यहां लंबे समय तक जमने नहीं दिए हैं। आगामी सियासी महासमर में उतरने से पहले सियासी दल इस आंकड़े का आकलन जरूर करेंगे। फिलहाल सियासत की खुमारी के बीच नेता यहां जीत का रास्ता खोजने में व्यस्त हैं।
महासमुंद जिले में आने वाली खल्लारी विधानसभा का सियासी समीकरण बेहद दिलचस्प रहा है। चुनावी आंकड़े भी बताते हैं कि यहां किसी एक दल या नेता का दबदबा लंबे समय तक नहीं रहा है। यही नहीं आदिवासी बाहुल्य इलाका होने के बावजूद यहां किसी आदिवासी नेता विधायक नहीं रहा। खल्लारी के सियासी इतिहास की बात की जाए तो यहां के मतदाताओं का सियासी मूड हमेशा ही बदलता रहा है और कोई भी नेता लंबे समय तक यहां पैर नहीं जमा पाया है। 1990 में यहां से जनता दल के डॉक्टर रमेश ने चुनाव जीता। 1993 में वो बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़े लेकिन कांग्रेस के भेखराम साहू से चुनाव हार गए। लेकिन 1998 में उन्होंने अपनी हार का बदला लेते हुए भेखराम साहू को मात दी। लेकिन 1999 में उनका निधन हो गया और उपचुनाव में उनके भाई परेश बागबहरा ने बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीता। लेकिन राज्य बनने के बाद उन्होंने अजीत जोगी के प्रभाव में आकर कांग्रेस ज्वाइन कर ली। 2003 में कांग्रेस ने भेखराम साहू को ही यहां से चुनाव मैदान में उतारा लेकिन वो बीजेपी के प्रीतम दीवान से हार गए। 2008 में परेश बागबहरा को कांग्रेस ने मौका दिया और उन्होंने प्रीतम दीवान को मात दी। लेकिन 2013 में बीजेपी के टिकट पर चुन्नीलाल साहू ने परेश बागबहरा को हराया। इस चुनाव में बीजेपी को जहां 58652 वोट मिले वहीं कांग्रेस 52653 वोट ले सकी। इस तरह जीत का अंतर 5999 वोटों का रहा।
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खल्लारी विधानसभा में इस बार कुल 1 लाख 95 हजार 188 मतदाता हैं जिसमें 96 हजार 785 पुरुष मतदाता और 98 हजार 403 महिला मतदाता हैं, जो इस बार नेताओं के किस्मत का फैसला करेंगे। खल्लारी के जाति समीकरण की बात की जाए तो यहां 34 फीसदी आदिवासी, 10 फीसदी एससी, 50 फीसदी ओबीसी वोटर हैं इसके अलावा 4 फीसदी सामान्य और 2 फीसदी अल्पसंख्यक वोटर भी हैं। यही वजह है कि इस बार भी पार्टियां जातिगत समीकरण से लेकर पुराने जीत हार के आंकड़ों को ध्यान में रखकर चुनाव जीतने गुणा भाग लगा रही हैं।
खल्लारी विधानसभा क्षेत्र में 2013 का चुनाव दिलचस्प होने जा रहा है। इस विधानसभा सीट से इस समय बीजेपी के चुन्नीलाल साहु विधायक हैं जबकि कांग्रेस और बीजेपी दोनों दलों से चुनाव लड़ चुके परेश बागबहरा छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस से चुनाव मैदान में हैं। हालांकि कांग्रेस के पास पुराने प्रत्याशी बचे नहीं है लिहाजा आने वाले चुनाव में नए चेहरे के भरोसे कांग्रेस चुनावी मैदान में उतरने जा रही है।
पिछले कुछ दिनों में खल्लारी विधायक चुन्नीलाल साहू की व्यस्तता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। घर पर भी मिलने जुलने वाले की भीड़ आम दिनों से कुछ ज्यादा होने लगी है। जाहिर है वे चुनाव की तैयारी में जुट गए हैं। 2013 में चुन्नीलाल साहू ने ही खल्लारी में कांग्रेस को हराकर सीट पर जीत हासिल की थी। उनका दावा है कि अपने कार्यकाल में उन्होंने अच्छा काम किया है लिहाजा पार्टी उन्हें इस बार भी मौका देगी। वैसे खल्लारी विधानसभा क्षेत्र में बीते 4 चुनाव का रिकार्ड देखें तो कोई भी प्रत्याशी लगातार दो बार यहां से चुनाव नहीं जीता। ऐसे में चुन्नीलाल साहू इस मिथक को तोड़ पाएंगे, कहना जल्दबाजी होगी। अगर चुन्नीलाल साहू की टिकट कटती है तो पूर्व विधायक प्रीतम दीवान इस रेस में सबसे आगे हैं। प्रीतम की पकड़ आदिवासी वोटर्स में अच्छी है, जिसकी वजह से प्रीतम दीवान टिकट की उम्मीद पाले बैठे हैं। इनके अलावा प्रदेश बीजेपी महिला उपाध्यक्ष अलका नरेश चंद्राकर भी सक्रिय नजर आ रही है। वहीं पार्टी अगर किसी नए चेहरे को मौका देती है तो जनपद उपाध्यक्ष भेखलाल साहू पहली पसंद हो सकते हैं।
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के संभावित उम्मीदवारों की बात की जाए तो कांग्रेस के पूर्व विधायक परेश बागबहरा के जेसीसीजे में शामिल होने के बाद पार्टी को अब नए चेहरे की तलाश है। ऐसे में जनपद सदस्य केशव चंद्राकर यहां से टिकट के दावेदार हैं। इसके अलावा जनपद सदस्य तेजन चंद्राकर भी इलाके में काफी सक्रिय हैं। उनकी पत्नी बागबहरा जनपद की अध्यक्ष हैं, जिनकी पहुंच का फायदा उन्हें मिल सकता है। इसके अलावा कांग्रेस से महेंद्र चंद्राकर का नाम भी सामने आ रहा है।
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जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ ने पूर्व विधायक परेश बागबाहरा को यहां से उम्मीदवार बनाया है। परेश बागबहरा को उम्मीद है कि, जनता ने उन्हें पहले भी मौका दिया है। अजीत जोगी का संसदीय क्षेत्र होने की वजह से उन्हें यहां चुनाव में फायदा होने जा रहा है।
जाहिर है दोनों तरफ दावदारों की लंबी लिस्ट है और इस लिस्ट में काट–छांट करना ही पार्टी के आलाकमान का सबसे बड़ा सिरदर्द है और ये भी तय है कि शार्टलिस्टिंग में जो जितनी सावधानी बरतेगा, उसकी जीत की संभावना सबसे ज्यादा होगी।