2020 दिल्ली दंगे: अदालत ने 12 आरोपियों को बरी किया
2020 दिल्ली दंगे: अदालत ने 12 आरोपियों को बरी किया
नयी दिल्ली, 31 अगस्त (भाषा) राष्ट्रीय राजधानी की एक अदालत ने 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों से जुड़े एक मामले में हत्या, दंगा और डकैती के आरोपों का सामना कर रहे 12 लोगों को बरी करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को केवल गैरकानूनी सभा में शामिल होने के आधार पर आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, खासकर जब तक उसके व्यक्तिगत कृत्यों का कोई प्रमाण न हो।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह आरोपी लोकेश सोलंकी, पंकज शर्मा, अंकित चौधरी, प्रिंस, जतिन शर्मा, हिमांशु ठाकुर, विवेक पंचाल, ऋषभ चौधरी, सुमित चौधरी, टिंकू अरोड़ा, संदीप और साहिल के खिलाफ मामले की सुनवाई कर रहे थे।
अदालत ने 25 अगस्त को दिये आदेश में कहा, ‘‘गैरकानूनी सभा में रहते हुए किसी व्यक्ति का खुद का कृत्य, जैसे घातक हथियार से लैस होना, ही भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 144 के तहत अपराध बनता है। केवल गैरकानूनी सभा में शामिल होने के आधार पर किसी व्यक्ति पर ऐसे आरोप नहीं लगा सकते।’’
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष के लिए प्रत्येक आरोपी के खिलाफ कथित अपराधों से जुड़े विशिष्ट कृत्यों को साबित करना जरूरी था और वह केवल उनके भीड़ का सदस्य होने के कथित आधार पर निर्भर नहीं रह सकता था।
सभी 12 आरोपी मुरसलीन की हत्या से जुड़े मामले में आरोपी थे।
मुरसलीन का शव 28 फरवरी, 2020 को जौहरीपुर तिराहे के पास एक नाले में मिला था।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष का मुख्य गवाह दिवेश राजपूत सुनवाई के दौरान अपने बयान से मुकर गया।
राजपूत को मुरसलीन की हत्या का प्रत्यक्षदर्शी बताया गया था और उसने कई आरोपियों के कथित तौर पर नाम लिए थे।
अदालत ने कहा कि उससे विस्तृत जिरह के बावजूद उसकी गवाही से ऐसा कुछ सामने नहीं आया, जो आरोपियों को गैरकानूनी सभा या हत्या से जोड़ता हो।
अदालत ने यह भी पाया कि एक अन्य गवाह निसार अहमद ने आरोपियों पर कोई ऐसा प्रत्यक्ष कृत्य करने का आरोप नहीं लगाया, जब वे कथित तौर पर भीड़ में शामिल थे।
अदालत ने कहा, ‘‘मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचता हूं कि केवल यह कह देने से कि जौहरीपुर पुलिया पर उसने जिस भीड़ को देखा था, वही उसके घर में हुई घटना के लिए जिम्मेदार थी, यह नहीं माना जा सकता कि आरोपी उसके घर में तोड़फोड़, लूटपाट और आगजनी करने वाली भीड़ का हिस्सा थे।’’
अदालत ने पुलिस के एक गवाह पर अभियोजन पक्ष की निर्भरता को भी खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि केवल आरोपियों के नाम पुकारे जाते हुए सुन लेना उनकी स्पष्ट पहचान के लिए पर्याप्त नहीं है।
अदालत ने हालांकि हिमांशु ठाकुर को आईपीसी की धारा 411 के तहत दोषी ठहराया।
अदालत ने पाया कि मुरसलीन का मोबाइल फोन उसके कब्जे से बरामद हुआ था और वह उस फोन में एक सिम कार्ड का इस्तेमाल कर रहा था।
भाषा जितेंद्र नरेश
नरेश

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