जिस कानून का व्यक्ति पालन ही नहीं कर सकता, वह कानून नहीं : इलाहाबाद उच्च न्यायालय

Ads

जिस कानून का व्यक्ति पालन ही नहीं कर सकता, वह कानून नहीं : इलाहाबाद उच्च न्यायालय

  •  
  • Publish Date - June 8, 2026 / 11:36 PM IST,
    Updated On - June 8, 2026 / 11:36 PM IST

प्रयागराज, आठ जून (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि जिस कानून का कोई व्यक्ति पालन ही नहीं कर सकता और न ही उसके अनुरूप कार्य कर सकता है, वह व्यर्थ है और उसे कानून नहीं कहा जा सकता।

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने नौकरशाही व्यवस्था की आलोचना करते हुए कहा कि कानून में स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद कई बार उसका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पाता, जिससे वह व्यवहार में अप्रभावी हो जाता है।

अदालत ने यह टिप्पणी दुष्कर्म पीड़िता एक नाबालिग लड़की के रिश्ते में नाना द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए की। याचिका में पॉक्सो अदालत, मेरठ को पीड़िता का लगभग पांच माह का अनचाहा गर्भ गिराने की अनुमति देने का निर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया था।

याचिका में वैकल्पिक रूप से मेरठ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) को गर्भपात कराने का निर्देश देने की भी मांग की गई थी।

मामले के अनुसार, पीड़िता लगभग 17 वर्ष की मंदबुद्धि नाबालिग है, जिससे दुष्कर्म किया गया था। वह अपने रिश्ते के नाना की देखरेख में रह रही है। उसके पिता करीब 10 वर्ष पहले परिवार छोड़कर चले गए थे और उनका कोई पता नहीं है, जबकि उसकी मां भी मानसिक रूप से कमजोर बताई गई है।

अदालत ने अभिलेखों का अवलोकन करने के बाद पाया कि पीड़िता के दादा ने 11 जून, 2023 को मेरठ जिले के रोहटा थाने में आरोपी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।

गर्भावस्था के लक्षण दिखाई देने पर पीड़िता ने दुष्कर्म की घटना की जानकारी अपने नाना को दी। इसके बाद उसे 11 जून को थाने ले जाया गया और 12 जून, 2023 को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), रोहटा में चिकित्सकीय परीक्षण के लिए पेश किया गया।

मेडिकल जांच रिपोर्ट में पीड़िता के 22 सप्ताह और छह दिन की गर्भवती होने की पुष्टि हुई। प्राथमिकी दर्ज होने के बाद पीड़िता के नाना ने पांच जुलाई, 2023 को मेरठ के सीएमओ से अनचाहा गर्भ गिराने की अनुमति मांगी, लेकिन इस अनुरोध पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।

इसके बाद उन्होंने 19 जुलाई, 2023 को पॉक्सो अदालत में आवेदन प्रस्तुत किया। हालांकि, अदालत ने यह कहते हुए आवेदन लौटा दिया कि आवेदक उच्च न्यायालय का रुख कर सकता है। इसके बाद 22 जुलाई, 2023 को उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की गई, जिसे चार अगस्त, 2023 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया।

अदालत ने पाया कि प्राथमिकी दर्ज होने से लेकर उच्च न्यायालय पहुंचने तक की प्रक्रिया में 54 दिन, यानी लगभग सात सप्ताह का समय बीत गया।

न्यायालय के आदेश के अनुपालन में पीड़िता को अस्पताल में भर्ती कराया गया, मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया और बोर्ड की सिफारिश पर चिकित्सकों ने 13 अगस्त, 2023 को उसका प्रसव कराया।

पूरे घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा, “उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालय इस विषय पर कई निर्णय दे चुके हैं तथा समय पर मेडिकल बोर्ड गठित कर पीड़िता के सर्वोत्तम हित में आवश्यक कदम उठाने के निर्देश बार-बार जारी कर चुके हैं।”

अदालत ने कहा, “इन न्यायिक निर्णयों के बावजूद अभिलेखों से स्पष्ट है कि संसद द्वारा बनाए गए प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने में राज्य सरकार लगातार विफल रही है।”

उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के अधिकारियों को दुष्कर्म के मामलों, दुष्कर्म के परिणामस्वरूप जन्मे बच्चों, परित्यक्त बच्चों तथा पीड़िताओं की मनोवैज्ञानिक स्थिति के संबंध में व्यापक सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक अध्ययन कराने का निर्देश दिया।

भाषा

सं, राजेंद्र रवि कांत