नयी दिल्ली, 25 फरवरी (भाषा) सीताराम केसरी के बाद कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभालने और सबसे लंबे समय तक इस जिम्मेदारी को निभाने वाली सोनिया गांधी 14 मार्च, 1998 को ‘24 अकबर रोड’ पर कार्य समिति की बैठक के दौरान जो कुछ हुआ उसको लेकर खुश नहीं थीं और उनका कहना था कि यदि सबकुछ सौहार्दपूर्ण ढंग से होता तो बेहतर रहता।
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई की पुस्तक ‘सोनिया: ए बायोग्राफी’ के हिंदी में अनूदित संस्करण ‘दास्तान-ए-सोनिया’ में यह दावा किया गया है। सेतु प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का संपादन पत्रकार जयजीत अकलेचा ने किया है।
इस पुस्तक में कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी के राजनीतिक और पारिवारिक जीवन से जुड़े कई प्रसंगों को समेटा गया है।
पत्रकार ने सोनिया गांधी के राजीव गांधी से विवाह से जुड़े कुछ प्रसंगों को इस पुस्तक में जगह दी है और इस बात का उल्लेख किया है कि 25 फरवरी, 1968 को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के ज्येष्ठ पुत्र के साथ विवाह के बाद वह कैसे एक ‘‘आदर्श बहू’’ बनीं और फिर 2004 से 2014 तक देश की सबसे रसूखदार राजनीतिक शख्सियत रहीं।
पुस्तक में 1998 में उन परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है जिनमें केसरी को हटाकर सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाया गया था।
इसमें कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यालय ‘24 अकबर रोड’ पर 14 मार्च, 1998 को कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में सीताराम केसरी के साथ हुए कथित अपमानजनक व्यवहार का हवाला देते हुए कहा गया है कि सोनिया गांधी को जिन परिस्थितियों में पार्टी की कमान मिली थी, उससे वह खुश नहीं थीं।
पुस्तक के मुताबिक, सोनिया गांधी ने उस समय पार्टी के एक पदाधिकारी से कहा था, “अगर सबकुछ सौहार्दपूर्ण ढंग से होता तो कहीं बेहतर होता।”
इसमें उस किस्से का भी जिक्र है जब राजीव गांधी ने विवाह से पूर्व पहली बार सोनिया की मुलाकात अपनी मां इंदिरा गांधी से करवाई थी और कैसे उसी मुलाकात के बाद इंदिरा ने उन्हें अपनी बहू बनाने का फैसला कर लिया था।
पुस्तक में कहा गया है, ‘‘लंदन में हुई इस मुलाकात के दौरान सोनिया को असहज देखकर इंदिरा ने उनसे फ्रेंच में बातचीत करनी शुरू की। चूंकि फ्रेंच में सोनिया काफी धाराप्रवाह थीं, इसलिए उन्हें ज्यादा दिक्कत नहीं आई। इसी बैठक में इंदिरा ने उन्हें अपने परिवार की बहू बनाने का निश्चय कर लिया था।’’
इसमें इस बात का भी जिक्र है कि इंदिरा गांधी के राजनीतिक जीवन के सबसे मुश्किल समय में कैसे सोनिया गांधी उनके साथ चट्टान की तरह खड़ी रहीं।
पुस्तक में कहा गया है, ‘‘1977 के लोकसभा चुनावों में हार के बाद इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री आवास छोड़कर अपनी बहुओं, पोते-पोतियों और सेवकों के साथ 12 विलिंग्डन क्रिसेंट स्थित घर में आना पड़ा। परिवार के लिए यह काफी मुश्किल वक्त था। इस बीच उनके पारिवारिक रसोइये की इलाहाबाद में एक सड़क हादसे में मृत्यु हो गई थी और इंदिरा किसी नए रसोइये को रखने से डर रही थीं। इंदिरा इस बात से आशंकित थीं कि उनके विरोधी लोग रसोइये के वेष में किसी जासूस को उनके यहां भेज सकते हैं या उसका इस्तेमाल उन्हें और उनके परिवार को जहर देने के लिए कर सकते हैं।’’
इसमें कहा गया है, ‘‘इस कठिन समय में सोनिया ने रसोईघर संभाला और विश्वासपात्र रसोइया नहीं मिलने तक उन्होंने महीनों पूरे परिवार के लिए खाना पकाया। वे अक्सर दिल्ली की खान मार्केट में सब्जियां और किराने का सामान खरीदती नजर आ जाती थीं…संजय गांधी (इंदिरा के छोटे बेटे) ने सोनिया को इंदिरा की ‘आदर्श बहू’ बताकर उनकी जी भरके प्रशंसा की थी।
किताब में इंदिरा की करीबी सहयोगी रहीं उषा भगत, पुपुल जयकर और मोहसिना किदवई के हवाले से बताया गया कि कैसे इंदिरा गांधी घर से जुड़े सभी मामलों में सोनिया पर निर्भर होती गईं। सोनिया उनकी साड़ियों का चुनाव करने और विदेश यात्राओं पर मुलाकात करने वाले गणमान्य मेहमानों के लिए उपहार चुनने में मदद करतीं थीं।
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