इलाहाबाद उच्च न्यायालय : ‘बुलडोजर न्याय’ पर पीठ का खंडित फैसला

इलाहाबाद उच्च न्यायालय : ‘बुलडोजर न्याय’ पर पीठ का खंडित फैसला

इलाहाबाद उच्च न्यायालय : ‘बुलडोजर न्याय’ पर पीठ का खंडित फैसला
Modified Date: July 21, 2026 / 11:36 pm IST
Published Date: July 21, 2026 11:36 pm IST

प्रयागराज, 21 जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों की पीठ ने ‘बुलडोजर न्याय’ पर रोक लगाने के अतिरिक्त कदमों की आवश्यकता के संबंध में खंडित फैसला दिया है।

‘बुलडोजर न्याय’ शब्द का उपयोग आरोपी व्यक्तियों से जुड़ी संपत्तियों को ध्वस्त करने के लिए किया जाता है।

पीठ के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने निर्देश दिया कि प्राथमिकी दर्ज किए जाने की तिथि से दो वर्ष तक आरोपी का मकान ध्वस्त करने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। लेकिन पीठ के दूसरे न्यायाधीश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने कहा कि ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया जा सकता।

इस मतभेद पर विचार करते हुए पीठ ने इस मामले को एक तीसरे न्यायाधीश द्वारा निर्णय के लिए मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया।

न्यायमूर्ति श्रीधरन ने सोमवार को अपने फैसले में कहा, ‘‘नगर पालिका कानूनों के उल्लंघन के बहाने किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति के मकान को ध्वस्त करने की जल्दबाजी अस्वीकार्य है क्योंकि कार्यकारी विवेक का प्रतिशोधात्मक प्रयोग है, इसलिए प्राथमिकी दर्ज किए जाने की तिथि से दो साल में उसका मकान ध्वस्त करने की कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती।’’

वहीं दूसरी ओर, न्यायमूर्ति नंदन ने अपने फैसले में कहा कि हमेशा यह माना जाता है कि सरकार केवल कानून के अनुसार और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए ही आगे बढ़ेगी। पीड़ित व्यक्ति के पास उच्च न्यायालय जाने का रास्ता हमेशा खुला रहता है।

न्यायमूर्ति नंदन ने कहा, “मेरे विचार से इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती क्योंकि असल में ऐसा करने से उस समय सीमा के दौरान कानून के अमल पर रोक लग जाएगी।”

विचार में मतभेद के बाद इस मुद्दे को मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया गया।

मुख्य न्यायाधीश को भेजे गए मामलों में से एक यह मुद्दा भी है कि क्या संविधान के अनुच्छेद 226 (रिट अधिकार-क्षेत्र) के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, सभी पर लागू होने वाला निर्देश जारी किया जा सकता है – जैसे कि दो साल या इसी तरह की अवधि के लिए सरकार को ‘उत्तर प्रदेश शहरी योजना और विकास अधिनियम, 1973’ के तहत कुछ अपवाद को छोड़कर कोई भी कार्रवाई करने से रोका जा सके।

दूसरा मुद्दा यह भेजा गया है कि क्या कानूनी नियम के कथित उल्लंघन के लिए नगर पालिका कानूनों के तहत प्रक्रिया शुरू करने से पूर्व अधिकारियों को इस प्रक्रिया के शुरू करने से एक साल पहले इरादे की सूचना देने का निर्देश दिया जा सकता है।

इससे पूर्व, इस वर्ष फरवरी में उच्च न्यायालय ने बुलडोजर कार्रवाई से दूर रहने के उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के बावजूद आरोपी व्यक्तियों की संपत्तियों को ध्वस्त करने की कार्रवाई जारी रखने पर उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाई थी।

मौजूदा मामले में उच्च न्यायालय फैमुद्दीन और उसके परिवार के दो अन्य सदस्यों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें आरोप लगाया गया है कि हमीरपुर जिले के थाना सुमेरपुर में उनके एक रिश्तेदार के खिलाफ पॉक्सो और धर्मांतरण मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद पुलिस की मिलीभगत में भीड़ ने उनके मकान को निशाना बनाया।

बाद में फैमुद्दीन को भी इस मामले में आरोपी बनाया गया। अब उन्हें उनके मकान को ध्वस्त किए जाने की आशंका है और उनके मुताबिक उनकी संपत्तियों को ध्वस्त करने के लिए चिन्हित किया गया है।

हालांकि, राज्य सरकार के वकील ने दलील दी कि यह याचिका समय से पूर्व दाखिल की गई है क्योंकि कोई वाद कारण उत्पन्न नहीं हुआ है और याचिकाकर्ताओं को जारी नोटिस पर उन्हें जवाब देना है।

न्यायमूर्ति श्रीधरन ने कहा कि इस अदालत में कई ऐसे मामले आए हैं जहां प्राथमिकी दर्ज किए जाने के बाद आरोपियों को ध्वस्तीकरण का नोटिस जारी किया गया है और इसके बाद ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई है।

हालांकि, न्यायमूर्ति नंदन ने कहा कि यह अदालत इस तथ्य से भलीभांति परिचित है कि आबादी बढ़ने से तेजी से अनाधिकृत निर्माण बढ़ा है, लेकिन इससे अवैध निर्माण को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता।

उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में जवाबदेही तय किए जाने की आवश्यकता है।

भाषा सं राजेंद्र धीरज

धीरज


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