जम्मू के जंगलों में अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया गया, 60 कनाल जमीन मुक्त करायी गयी
जम्मू के जंगलों में अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया गया, 60 कनाल जमीन मुक्त करायी गयी
जम्मू, 19 मई (भाषा) जम्मू शहर के बाहरी इलाकों में मंगलवार को पुलिस और वन विभाग ने अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया और लगभग 60 कनाल की बहुमूल्य वन भूमि को पुनः प्राप्त करने के लिए लगभग 20-30 ढांचों को ध्वस्त कर दिया। अधिकारियों ने यह जानकारी दी।
वन विभाग, वन संरक्षण बल, राजस्व विभाग और पुलिस के अधिकारियों ने वन क्षेत्र से कथित अतिक्रमणकारियों को हटाने के लिए अभियान चलाया।
अधिकारियों ने बताया कि इस दौरान निचली शिवालिक पर्वतमाला के राईका बांदी वन क्षेत्र में करोड़ों रुपये मूल्य की लगभग 60 कनाल भूमि को मुक्त कराया गया।
उन्होंने बताया कि कथित अतिक्रमणकारियों के प्रतिरोध के बावजूद यह अभियान लगभग तीन से चार घंटे तक जारी रहा और इस दौरान महामाया वन क्षेत्र में लगभग 20-30 ढांचों को ध्वस्त कर दिया गया, जिनमें से अधिकांश कच्चे भवन थे।
अधिकारियों ने कहा कि पांच. छह साल पहले महामाया वन क्षेत्र में केवल कुछ ही ढांचे थे लेकिन अब दर्जनों अवैध ढांचे खड़े कर दिए गए हैं और नये निर्माण कार्य भी जारी हैं।
अधिकारियों ने बताया कि वन विभाग जम्मू के वन क्षेत्रों में स्थित आदिवासी बस्तियों और अन्य आवासों का मानचित्रण करेगा ताकि आगे अतिक्रमण को रोका जा सके।
एक अधिकारी ने कहा, “ऐसे सभी क्षेत्रों की तस्वीरें और वीडियो लिए जाएंगे तथा दस्तावेजों के सत्यापन के बाद रिकॉर्ड आधिकारिक वेबसाइटों पर अपलोड किए जाएंगे।”
अधिकारी ने कहा, “हम किसी भी वन भूमि पर अतिक्रमण नहीं होने देंगे और सभी अवैध कब्जे हटाए जाएंगे।”
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जम्मू जिले में 1,45,487 कनाल और छह मरला भूमि पर अतिक्रमण किया गया था, जबकि श्रीनगर जिले में 13,862.95 कनाल भूमि दर्ज की गई। यह दर्शाता है कि अकेले जम्मू जिले में श्रीनगर की तुलना में दस गुना से भी अधिक भूमि पर अतिक्रमण था।
पर्यावरण विशेषज्ञों ने जम्मू शहर में बढ़ते तापमान और अचानक आने वाली बाढ़ की घटनाओं के लिए यहां की पहाड़ियों और वन क्षेत्रों में धड़ल्ले से हो रहे अतिक्रमण को जिम्मेदार ठहराया है।
पर्यावरणविद् प्रोफेसर भूषण लाल ने कहा, ‘निचली शिवालिक पहाड़ियों और निक्की तवी क्षेत्रों को जम्मू शहर के ‘ऑक्सीजन फेफड़े’ (ऑक्सीजन लंग्स) माना जाता है, लेकिन वहां धीरे-धीरे बड़े पैमाने पर अतिक्रमण और अवैध निर्माण हो रहे हैं। इससे यह क्षेत्र कंक्रीट के जंगल में बदल रहा है और शहर की जलवायु पर इसका बुरा असर पड़ रहा है।’
भाषा प्रचेता नरेश
नरेश

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