नयी दिल्ली, पांच मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने केरल के शबरिमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को चुनौती देने वाली ‘इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन’ की 2006 की जनहित याचिका पर तीखी टिप्पणी करते हुए मंगलवार को कहा ‘‘क्या आप देश के मुख्य पुजारी हैं?’’
उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की कि जनहित याचिका ‘कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग’ थी और ‘इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन’ को इस तरह की जनहित याचिकाएं दायर करने के बजाय बार और अपने युवा सदस्यों के कल्याण के लिए काम करना चाहिए।
नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी केरल के शबरिमला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से संबंधित याचिकाओं और विभिन्न धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा पर सुनवाई करते हुए की।
पीठ में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
‘इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन’ की ओर से पेश हुए अधिवक्ता रवि प्रकाश गुप्ता ने बताया कि जून 2006 में अखबार में चार लेख प्रकाशित हुए थे और जनहित याचिका उन्हीं पर आधारित है। उन्होंने तर्क दिया कि एसोसिएशन भगवान अयप्पा के भक्तों की आस्था को चुनौती नहीं दे रहा है, बल्कि उसका समर्थन कर रहा है।
जैसे ही वकील ने अपनी दलीलें प्रस्तुत करनी शुरू कीं, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने टिप्पणी की, ‘‘ आप जैसी एक विधिक (कानूनी) संस्था की कोई आस्था कैसे हो सकती है? यह तो किसी व्यक्ति के लिए होती है। आपके पास कोई अंतरात्मा नहीं है।’’
न्यायमूर्ति कुमार ने यह भी पूछा, ‘‘क्या आपकी संस्था ने पीआईएल दायर करने के लिए कोई प्रस्ताव पारित किया है? क्या इस पर आपके अध्यक्ष ने हस्ताक्षर किए हैं?’’
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘ आपने यह पीआईएल क्यों दायर की है? क्या आप देश के मुख्य पुजारी हैं?’’ इस पर वकील ने जवाब दिया कि उनकी संस्था एक पंजीकृत संस्था है।
पहले दी गई दलीलों का हवाला देते हुए अधिवक्ता ने कहा कि मंदिर के तंत्री (पुजारी) ने उल्लेख किया है कि युवा महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि देवता युवा महिलाओं को पसंद नहीं करते। उन्होंने नौ-न्यायाधीशों की पीठ के संदर्भ में तीन न्यायाधीशों द्वारा की गई टिप्पणियों पर भी कड़ी आपत्ति जताई।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने तब टिप्पणी की, ‘‘क्या यंग लॉयर्स एसोसिएशन के पास और कोई काम नहीं है? क्या वे बार के कल्याण के लिए काम नहीं कर सकते या इस देश की न्यायिक व्यवस्था में पीठ की सहायता नहीं कर सकते?’’
मामले की सुनवाई जारी है।
पांच जजों की संविधान पीठ ने सितंबर 2018 में 4:1 के बहुमत से दिए गए अपने फैसले में शबरिमला अयप्पा मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी और अपने फैसले में कहा था कि सदियों पुरानी यह हिंदू धार्मिक प्रथा गैर-कानूनी और असंवैधानिक है।
भाषा शोभना नरेश
नरेश