Arshad Madani on Vande Mataram: ‘यह एक पक्षपाती और ज़बरदस्ती थोपा गया फैसला है’, ‘वंदे मातरम्’ अनिवार्य करने पर भड़के मौलाना अरशद मदनी, केंद्र सरकार पर बोला हमला

Ads

Arshad Madani on Vande Mataram: 'यह एक पक्षपाती और ज़बरदस्ती थोपा गया फैसला है', ‘वंदे मातरम्’ अनिवार्य करने पर भड़के मौलाना अरशद मदनी, केंद्र सरकार पर बोला हमला

  •  
  • Publish Date - February 12, 2026 / 02:09 PM IST,
    Updated On - February 12, 2026 / 02:10 PM IST

Arshad Madani on Vande Mataram | Photo Credit: IBC24

HIGHLIGHTS
  • गृह मंत्रालय ने वंदे मातरम् के छह अंतरा वाले संस्करण को अनिवार्य किया
  • जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया
  • फैसले पर देशभर में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज़

नई दिल्ली: Arshad Madani on Vande Mataram राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से एक नया आदेश जारी कर दिया गया है। नए आदेश के अनुसार, वंदे मातरम् के छह अंतरा वाले संस्करण को बजाना या गाना अनिवार्य कर दिया है। जिसको लेकर अब कई तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही है। इसी बीच जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने केंद्र सरकार के इस फैसले पर नाराजगी जताते हुए कहा कि यह पक्षपाती और जबरदस्ती थोपा गया फैसला है। संविधान की धारा 25 और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों का खुला उल्लंघन बताया है।

Arshad Madani Statement  केंद्र सरकार पर साधा निशाना

अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने अपने सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट किया है। जिसमें उन्होंने लिखा है कि ‘“वंदे मातरम्” को राष्ट्रीय गीत के रूप में सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और आयोजनों में इसकी समस्त पंक्तियों को अनिवार्य करना केंद्र सरकार का न केवल एक पक्षपाती और ज़बरदस्ती थोपा गया फैसला है, बल्कि यह संविधान में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता पर खुला हमला और अल्पसंख्यकों के अधिकार छीनने का निंदनीय प्रयास है। मुसलमान किसी को वंदे मातरम् पढ़ने या उसकी धुन बजाने से नहीं रोकते, मगर क्योंकि उसकी कुछ पंक्तियाँ बहुदेववादी आस्था पर आधारित हैं और मातृभूमि को ईश्वर के रूप में प्रस्तुत करती हैं, जो एकेश्वरवादी धर्म की आस्था से टकराती हैं, इसलिए मुसलमान, जो केवल एक अल्लाह की वंदना करता है, उसको इसे पढ़ने पर विवश करना संविधान की धारा 25 और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों का खुला उल्लंघन है।’

उनहोंने आगे कहा कि ‘आज इस गीत को अनिवार्य कर देना और नागरिकों पर थोपने का प्रयास वास्तव में देशप्रेम नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति, सांप्रदायिक एजेंडे और जनता का ध्यान मूल समस्याओं से हटाने की सोची-समझी चाल है। मातृभूमि से प्रेम का आधार नारे नहीं, बल्कि चरित्र और बलिदान हैं, जिनका उज्ज्वल उदाहरण मुसलमानों और जमीयत उलमा-ए-हिंद का अभूतपूर्व संघर्ष है। इस प्रकार के फ़ैसले देश की शांति, एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमज़ोर करने के साथ-साथ संविधान का भी उल्लंघन हैं।’

‘मुसलमान सिर्फ अल्लाह की इबादत करता है’

‘याद रखिए! मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है। हम सब कुछ बर्दाश्त कर सकते हैं, मगर अल्लाह के साथ किसी को शरीक करना कभी स्वीकार नहीं कर सकते। इसलिए वंदे मातरम् को अनिवार्य कर देना संविधान की आत्मा, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर खुला हमला है।’

इन्हें भी पढ़ें:-

नया आदेश क्या कहता है?

गृह मंत्रालय ने वंदे मातरम् के छह अंतरा वाले संस्करण को सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और आयोजनों में अनिवार्य कर दिया है।

विवाद क्यों हो रहा है?

कुछ धार्मिक संगठनों का कहना है कि गीत की पंक्तियाँ उनकी आस्था से टकराती हैं और इसे अनिवार्य करना धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है।

संविधान की कौन सी धारा का हवाला दिया जा रहा है?

धारा 25, जो धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देती है।