अधिकारियों से मामले में किसी भी पक्ष का समर्थन करने की अपेक्षा नहीं की जाती: न्यायालय
अधिकारियों से मामले में किसी भी पक्ष का समर्थन करने की अपेक्षा नहीं की जाती: न्यायालय
नयी दिल्ली, 19 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि किसी मामले में बहस करते समय और अदालत के समक्ष जवाबी हलफनामा दाखिल करते समय सरकार और उसके अधिकारियों का कर्तव्य वास्तविक सहायता प्रदान करना है तथा उनसे यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे कानून के विपरीत किसी भी पक्ष का समर्थन करें।
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने ये टिप्पणियां कीं। पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार के कुछ अधिकारियों के आचरण का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने एक मामले में अपीलकर्ता के पक्ष का ‘‘जोरदार समर्थन’’ किया।
एक कॉलेज के प्राचार्य की नियुक्ति से संबंधित मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पिछले वर्ष मई के आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर पीठ ने अपना फैसला सुनाया।
पीठ ने कहा कि यह स्पष्ट है कि 21 अगस्त 2023 को उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग अधिनियम, 2023 लागू होने के बाद, अधिकारियों के लिए उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा सेवा आयोग अधिनियम, 1980 के तहत तैयार की गई सूची के आधार पर कार्य करना उचित नहीं था, क्योंकि उस अधिनियम को निरस्त कर दिया गया था।
पीठ ने कहा कि निदेशक के पास पुरानी सूची को फिर से लागू करने और 13 दिसंबर 2023 को अपीलकर्ता के पक्ष में पत्र लिखने का कोई कारण ही नहीं था।
पीठ ने कहा, ‘‘इतना कहना काफी है कि उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव उन अधिकारियों के आचरण की जांच करें, जिन्होंने उच्च न्यायालय और इस अदालत के सामने ऐसा गैरकानूनी पक्ष रखते हुए हलफनामा दाखिल किया था। यह कानून के तहत पूरी तरह गलत है और उच्च न्यायालय के फैसले के भी खिलाफ है।’’
न्यायालय ने कहा, ‘‘यह ध्यान रखना आवश्यक है कि सरकार और उसके अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करते समय और न्यायालय के समक्ष मामले की पैरवी करते समय वास्तविक सहायता प्रदान करें।’’
पीठ ने कहा कि ऐसी सहायता तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए और मामले पर लागू कानून के अनुसार होनी चाहिए।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘अधिकारियों से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे कानून के विपरीत किसी भी पक्ष का समर्थन करें या ऐसा हलफनामा दाखिल करें जिसमें कानून के अनुरूप तथ्य प्रकट न हों।’’
पीठ ने कहा कि चूंकि संबंधित अधिकारी इस मामले में पक्षकार नहीं हैं, इसलिए वह कोई प्रतिकूल निर्देश जारी करने को इच्छुक नहीं है।
हालांकि, शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को यह छूट दी कि वह अदालत की टिप्पणियों पर विचार करे और यदि आवश्यक हो, तो कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करे।
भाषा सुभाष अविनाश
अविनाश

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