नयी दिल्ली, 11 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को बार और बेंच को न्याय के रथ के दो पहिये बताते हुए इस बात पर जोर दिया कि दोनों के निर्बाध संबंध न्याय को बढ़ावा देते हैं।
उच्चतम न्यायालय ने गुजरात उच्च न्यायालय के उस आदेश को निलंबित करते हुये यह टिप्पणी की जिसमें गुजरात उच्च न्यायालय अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष यतिन ओझा को राज्य न्यायपालिका के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने के लिए दोषी ठहराया गया था और अदालत के उठने तक उन्हें सजा सुनाई गई थी।
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि न्यायालय के पास काफी अधिकार हैं, फिर भी न्यायिक उदारता का सच्चा सार संयम में निहित है।
पीठ ने कहा कि कठोर दंडात्मक कार्रवाई की तुलना में संयमित फटकार और सुधारात्मक मार्गदर्शन अधिक समझदारी भरा रास्ता है।
न्यायालय ने कहा, “वे (वकील और न्यायालय) आपस में अटूट रूप से जुड़े हुए हैं, वे न्याय के रथ के दो पहियों के रूप में कार्य करते हैं। कानून के जटिल क्षेत्र में सही राह खोजने और निष्पक्ष एवं न्यायसंगत परिणाम प्राप्त करने के लिए, इन पहियों को पूर्ण सामंजस्य में चलना चाहिए, और कानून के शासन को बनाए रखने के लिए एक साझा समर्पण से बंधे रहना चाहिए।”
न्यायालय ने कहा, “बार, अपनी भूमिका में प्रभावशाली, सत्य की निरंतर खोज का काम करता है; यह मुद्दों को पेश करता है और उन पर बहस करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि वादी की आवाज निडरता से व्यक्त की जाए। इस प्रतिमान को पूर्ण करते हुए, पीठ केवल निर्णय देने वाली निर्णायक संस्था के रूप में ही कार्य नहीं करती।”
न्यायालय ने कहा कि यह पीठ संविधान की अंतिम संरक्षक है, जिसे कानून की व्याख्या करने, मौलिक अधिकारों की रक्षा करने और अटूट बुद्धिमत्ता के साथ निष्पक्ष, समयबद्ध न्याय प्रदान करने का कार्य सौंपा गया है।
न्यायालय ने कहा कि यदि एक स्तंभ की नींव कमजोर हो जाती है, तो दूसरा स्तंभ मजबूती से खड़ा नहीं रह सकता।
भाषा प्रशांत अविनाश
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