भवानीपुर:कांग्रेस के प्रभुत्व से बनर्जी के गढ़ बनने तक का सफर तय कर चुकी सीट नए मुकाबले के लिए तैयार

Ads

भवानीपुर:कांग्रेस के प्रभुत्व से बनर्जी के गढ़ बनने तक का सफर तय कर चुकी सीट नए मुकाबले के लिए तैयार

  •  
  • Publish Date - March 22, 2026 / 01:39 PM IST,
    Updated On - March 22, 2026 / 01:39 PM IST

(प्रदीप्त तापदार)

कोलकाता, 22 मार्च (भाषा) पश्चिम बंगाल की राजनीति के लगातार बदलते परिदृश्य में भवानीपुर जैसी कुछ ही सीटें हैं, जिनके साथ इतिहास और प्रतीकात्मक महत्व इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है। यह केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि वह राजनीतिक सफर है जो राज्य में कांग्रेस के लंबे प्रभुत्व से लेकर तृणमूल कांग्रेस के उभार तक के बदलाव को साफ तौर पर दर्शाता है।

आज मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का राजनीतिक गढ़ मानी जाने वाली भवानीपुर सीट हमेशा से तृणमूल कांग्रेस की पहचान नहीं रही। आजादी के बाद दशकों तक दक्षिण कोलकाता की यह सीट कांग्रेस का मजबूत गढ़ थी और राज्य के कई प्रभावशाली नेताओं का राजनीतिक आधार रही।

पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने इस सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में और बाद में निर्दलीय के तौर पर चुनाव जीता। कांग्रेस के अन्य दिग्गज नेताओं जैसे मीरा दत्ता गुप्ता और रथिन तालुकदार ने भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया, जिससे भवानीपुर कांग्रेस का प्रमुख शहरी गढ़ बन गया।

कई वर्षों तक यह सीट कांग्रेस के प्रभाव में रही, जबकि वामपंथी दल उस समय केवल 1969 में थोड़े समय के लिए यहां जीत हासिल कर सके, जब इस सीट का नाम बदलकर कालीघाट विधानसभा क्षेत्र कर दिया गया था। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता साधन गुप्ता ने बांग्ला कांग्रेस और माकपा की संयुक्त मोर्चा की दूसरी सरकार के दौरान यह सीट जीती। वह 1953 में भारत के पहले दृष्टिहीन सांसद बने थे।

भवानीपुर की राजनीतिक यात्रा ने तब अप्रत्याशित मोड़ ले लिया जब यह सीट 1972 में परिसीमन के बाद चुनावी नक्शे से ही गायब हो गयी। लगभग चार दशकों तक यह सीट केवल राजनीतिक स्मृतियों में ही बनी रही।

जब 2011 के परिसीमन के दौरान यह सीट दोबारा अस्तित्व में आयी, तब पश्चिम बंगाल की राजनीति भी बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही थी। उसी वर्ष वाम मोर्चा के 34 साल के शासन का अंत हुआ और ममता बनर्जी का दौर शुरू हुआ।

नए सिरे से बनी भवानीपुर सीट जल्द ही तृणमूल के उभार से जुड़ गई। बनर्जी ने 2011 के पहले चुनाव में अपने करीबी सहयोगी सुब्रत बक्शी को इस सीट से उम्मीदवार बनाया।

बक्शी ने 64 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल कर माकपा के नारायण जैन को करीब 50,000 वोट से हराया और भवानीपुर को तृणमूल का मजबूत गढ़ बना दिया।

इसके बाद बक्शी ने सीट छोड़ दी ताकि तृणमूल की भारी जीत के बाद मुख्यमंत्री बनीं ममता बनर्जी उपचुनाव के जरिए विधानसभा में प्रवेश कर सकें।

बनर्जी ने करीब 77 प्रतिशत वोट हासिल कर माकपा की नंदिनी मुखर्जी को 54,000 से अधिक मतों से हराया और भवानीपुर में अपना मजबूत राजनीतिक आधार स्थापित किया। तब से यह सीट तृणमूल के कब्जे में बनी हुई है।

कोलकाता के महापौर और मंत्री फिरहाद हाकिम ने कहा, ‘‘भवानीपुर हमारे लिए सिर्फ एक सीट नहीं है। यह वह जगह है जहां लोगों ने ममता बनर्जी की विकास और समावेश की राजनीति पर बार-बार भरोसा जताया है।’’

वर्षों से भवानीपुर में कई हाई-प्रोफाइल मुकाबले हुए, लेकिन नतीजा नहीं बदला।

वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में वाम दलों और कांग्रेस ने गठबंधन कर वरिष्ठ कांग्रेस नेता दीपा दासमुंशी को बनर्जी के खिलाफ उतारा। इस मुकाबले को ‘‘दीदी बनाम बौदी’’ के रूप में पेश किया गया।

बनर्जी ने 65,520 वोट हासिल कर दासमुंशी (40,219 वोट) को आसानी से हराया। भाजपा के चंद्र कुमार बोस तीसरे स्थान पर रहे, जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिवार से ताल्लुक रखते हैं।

पांच साल बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में बनर्जी ने नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का फैसला किया, जहां उनका मुकाबला उनके पूर्व सहयोगी शुभेंदु अधिकारी से हुआ।

भवानीपुर से तृणमूल ने शोवनदेव चट्टोपाध्याय को उम्मीदवार बनाया, जबकि भाजपा ने अभिनेता रुद्रनील घोष को मैदान में उतारा।

घोष को 44,786 वोट मिले, जो इस सीट पर किसी विपक्षी उम्मीदवार को अब तक मिले सबसे ज्यादा वोट थे लेकिन वह 28,000 से अधिक वोटों से हार गए।

उसी वर्ष यह सीट और अधिक महत्वपूर्ण हो गई। नंदीग्राम में अधिकारी से 1,956 वोटों से हारने के बाद ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बने रहने के लिए उपचुनाव जीतना जरूरी था। एक बार फिर भवानीपुर केंद्र में आया। चट्टोपाध्याय ने सीट खाली की और बनर्जी ने भाजपा की प्रियंका टिबरेवाल के खिलाफ उपचुनाव लड़ा।

बनर्जी ने 58,000 से अधिक वोटों के अंतर और लगभग 72 प्रतिशत मतों के साथ जीत हासिल की, जिससे भवानीपुर उनकी सबसे भरोसेमंद सीट के रूप में स्थापित हो गया।

भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र मुख्यतः कोलकाता नगर निगम के वार्डों से बना है जो दक्षिण कोलकाता की सामाजिक विविधता को दर्शाता है। यहां बंगाली मध्यमवर्गीय इलाकों के साथ बड़ी संख्या में हिंदी भाषी व्यापारी समुदाय भी रहते हैं। इस क्षेत्र में प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर भी स्थित है, जो कोलकाता के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है और यहीं ममता बनर्जी का निवास भी है।

अनुमान के अनुसार, यहां लगभग 42 प्रतिशत मतदाता बंगाली हिंदू, 34 प्रतिशत गैर-बंगाली हिंदू और करीब 24 प्रतिशत मुस्लिम हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सामाजिक मिश्रण ममता बनर्जी की शहरी जनवादी राजनीति के अनुकूल रहा है।

राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा, ‘‘भवानीपुर दक्षिण कोलकाता की बहुसांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है। ममता बनर्जी ने यहां समुदायों से परे एक व्यक्तिगत जुड़ाव बनाया है।’’

जैसे-जैसे 2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, भवानीपुर एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में है।

संभावना है कि ममता बनर्जी इसी सीट से चुनाव लड़ेंगी, जबकि भाजपा ने उनके खिलाफ नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी को मैदान में उतारा है, जिन्होंने 2021 में नंदीग्राम में उन्हें हराया था।

इस मुकाबले ने इस सीट की राजनीतिक कहानी में एक नया नाटकीय मोड़ जोड़ दिया है।

चक्रवर्ती ने कहा, ‘‘भवानीपुर में बनर्जी को चुनौती देकर भाजपा इस सीट को मनोवैज्ञानिक युद्ध का मैदान बनाना चाहती है।’’

मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया ने भी इस सीट को लेकर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। भवानीपुर में मतदाता सूची से 47,000 से अधिक नाम हटाए गए हैं, जबकि 14,000 से अधिक मतदाता सत्यापन के अधीन हैं।

भाजपा नेता सुकांत मजूमदार ने कहा, ‘‘पश्चिम बंगाल में समय बदल चुका है। जो सीटें कभी अजेय मानी जाती थीं, वे अब चुनौती का सामना कर रही हैं और भवानीपुर भी इसका अपवाद नहीं होगा।’’

निकटवर्ती चुनावी मुकाबले से परे भवानीपुर अब राज्य की सबसे प्रतीकात्मक राजनीतिक लड़ाई के केंद्र में है।

भाषा गोला सिम्मी

सिम्मी