भाजपा नेता अमरिंदर सिंह ने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर सवाल उठाए

भाजपा नेता अमरिंदर सिंह ने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर सवाल उठाए

भाजपा नेता अमरिंदर सिंह ने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर सवाल उठाए
Modified Date: September 3, 2026 / 08:29 pm IST
Published Date: September 3, 2026 8:29 pm IST

नयी दिल्ली, तीन सितंबर (भाषा) भाजपा नेता और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से स्पष्ट करने को कहा है कि ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का क्या अर्थ है और ये श्रेणी वैध असहमति से किस तरह अलग है।

सिंह की यह टिप्पणी स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री के संबोधन में की गई टिप्पणी के बाद आई है। सिंह की टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब अगले साल पंजाब में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और भाजपा राज्य में अपना विस्तार करने की कोशिश कर रही है।

पूर्व मुख्यमंत्री ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में लिखे एक लेख में कहा, ‘‘हमें नक्सल शब्द का इस्तेमाल बहुत हल्के ढंग से नहीं करना चाहिए। भारत को राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। सही मायने में देखें तो दोनों एक-दूसरे को मजबूत करते हैं।’’

अपने लेख में सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री ने युवाओं के हालिया प्रदर्शनों को ‘दिमागी नक्सलवाद’ नहीं कहा था और इस तरह का संबंध उनके साथ जोड़ना अनुचित होगा। हालांकि, उन्होंने कहा कि राजनीतिक बयानों का असर अक्सर उनके मूल संदर्भ तक सीमित नहीं रहता।

भाजपा नेता ने कहा, ‘‘जब राजनीतिक दल, टेलीविजन चैनल और सामाजिक माध्यमों पर ऐसे शब्द बार-बार दोहराए जाते हैं तो उनका दायरा तेजी से बढ़ सकता है, इसलिए स्पष्टता जरूरी है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘लाल किले से बोले गए शब्दों का विशेष महत्व होता है। जब प्रधानमंत्री कहते हैं कि लोगों की एक श्रेणी की ‘पहचान’ की जानी चाहिए और उसे ‘अलग-थलग’ किया जाना चाहिए, तो नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि उस श्रेणी और वैध असहमति के बीच अंतर क्या है।’’

सिंह ने कहा, ‘‘अगर इस शब्द का मतलब ऐसे लोगों से है जो जानबूझकर माओवादी हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं, तो यह अंतर स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए और कानून को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। लेकिन अगर कभी इसका दायरा केवल कट्टरपंथी, अलोकप्रिय या सरकार की कड़ी आलोचना करने वाली राय तक बढ़ाया गया, तो लोकतांत्रिक भारत को इसकी सीमा तय करनी चाहिए।’’

सिंह ने कहा कि गणराज्य में संविधान और कानून का पालन जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि नागरिकों को मौजूदा सरकार के प्रति बिना सवाल किए वफादार रहना होगा।

उन्होंने कहा कि नागरिकों को असहमति जताने का अधिकार है। साथ ही कहा कि नागरिक स्वतंत्रता को संगठित हिंसा की आड़ नहीं बनने दिया जा सकता।

सिंह ने लेख में कहा, ‘‘विभाजन की रेखा वामपंथ बनाम दक्षिणपंथ, सरकार बनाम विपक्ष या राष्ट्रवादी बनाम आलोचक के बीच नहीं है। यह कानून के दायरे में रहने वाली असहमति और जानबूझकर हिंसा को बढ़ावा देने वाले कृत्य के बीच है।’’

भाषा शफीक माधव

माधव


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