कलकत्ता उच्च न्यायालय ने इस्कॉन को मध्याह्न भोजन सौंपने के प्रस्ताव पर बंगाल सरकार से मांगा जवाब

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कलकत्ता उच्च न्यायालय ने इस्कॉन को मध्याह्न भोजन सौंपने के प्रस्ताव पर बंगाल सरकार से मांगा जवाब

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  • Publish Date - July 8, 2026 / 07:32 PM IST,
    Updated On - July 8, 2026 / 07:32 PM IST

कोलकाता, आठ जुलाई (भाषा) कलकत्ता उच्च न्यायालय ने बुधवार को पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया कि वह एक हलफनामा दाखिल कर ‘इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस‘ (इस्कॉन) को कोलकाता के स्कूलों में मध्याह्न भोजन उपलब्ध कराने के प्रस्ताव पर अपना पक्ष स्पष्ट करे।

अदालत में एक जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें दावा किया गया कि प्रधानमंत्री पोषण योजना के तहत पश्चिम बंगाल के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में भोजन पकाने और परोसने का कार्य इस्कॉन को सौंपे जाने से छात्रों को अंडे जैसे पोषक आहार से वंचित होना पड़ेगा तथा स्वयं सहायता समूह की हजारों महिलाओं की आजीविका भी प्रभावित होगी।

वर्तमान में राज्यभर के स्कूलों में मध्याह्न भोजन तैयार करने का कार्य स्वयं सहायता समूह की महिलाएं करती हैं।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपब्रत चक्रवर्ती की अध्यक्षता वाली खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति पार्थ सारथी चटर्जी भी शामिल थे, ने राज्य सरकार को इस मामले में अपना पक्ष हलफनामे के माध्यम से रखने का निर्देश दिया।

खंडपीठ ने कहा कि इस मामले में अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद की जाएगी।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने अदालत में कहा कि मध्याह्न भोजन योजना का उद्देश्य छात्रों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराकर स्कूल छोड़ने की समस्या को रोकना है।

उन्होंने कहा कि इस योजना का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराना भी है। यदि भोजन पकाने और वितरण का कार्य इस्कॉन को सौंप दिया जाता है, तो इन महिलाओं की आजीविका समाप्त हो जाएगी।

बनर्जी ने अदालत को बताया कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा में कहा था कि पीएम-पोषण योजना के तहत 1,800 सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में मध्याह्न भोजन इस्कॉन द्वारा उपलब्ध कराया जाएगा।

उन्होंने कहा कि इस केंद्रीय योजना को लागू करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है और इसका उद्देश्य छात्रों को पौष्टिक पका हुआ भोजन उपलब्ध कराना है।

अदालत के एक प्रश्न के उत्तर में बनर्जी ने कहा कि इस संबंध में राज्य सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं हुई है, लेकिन मुख्यमंत्री ने विधानसभा में इसकी घोषणा की है।

अदालत ने कहा कि वर्ष 2010 की केंद्रीय अधिसूचना, जिसके तहत मध्याह्न भोजन योजना शुरू की गई थी, उसमें गैर-सरकारी संगठनों तथा अन्य उपयुक्त संस्थाओं की भागीदारी पर कोई रोक नहीं लगाई गई है।

खंडपीठ ने यह भी जानना चाहा कि क्या मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद इस दिशा में कोई औपचारिक कार्रवाई की गई है या नहीं।

राज्य सरकार की ओर से पेश महाधिवक्ता सुरजीत नाथ मित्रा ने कहा कि इस संबंध में अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। उन्होंने दलील दी कि जनहित याचिका केवल आशंकाओं पर आधारित है और इस विषय में सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं किया गया है।

भाषा शोभना प्रशांत

प्रशांत