सीईसी की गिरफ्तारी, पुरानी मतदाता सूची से दोबारा बंगाल चुनाव कराने की ममता की मांग

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सीईसी की गिरफ्तारी, पुरानी मतदाता सूची से दोबारा बंगाल चुनाव कराने की ममता की मांग

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  • Publish Date - September 23, 2026 / 08:34 PM IST,
    Updated On - September 23, 2026 / 08:34 PM IST

कोलकाता, 23 सितंबर (भाषा) पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी और राज्य में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से पहले की मतदाता सूची के आधार पर फिर से चुनाव कराने की बुधवार को मांग की।

मतदाता सूची पुनरीक्षण से जुड़े फैसलों को लेकर निर्वाचन आयोग के भीतर असहमति की एक खबर के बाद बनर्जी ने आयोग पर अपना हमला और तेज कर दिया।

बनर्जी ने फेसबुक लाइव में आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और निर्वाचन आयोग ने इस साल पश्चिम बंगाल में हुए चुनाव को ‘‘लूट’’ लिया और दावा किया कि मतदाताओं को अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने से रोका गया।

उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आयी है, जब अंग्रेजी दैनिक ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित एक खबर में दावा किया गया है कि देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान विभिन्न राज्यों में मतदाताओं के नाम हटाए जाने समेत कई मुद्दों को लेकर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आपत्तियां जताई थीं। इस खबर के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया।

हालांकि, निर्वाचन आयोग ने कहा है कि एसआईआर से जुड़े फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिये गए थे।

बनर्जी ने फेसबुक लाइव में कहा, “अब यह साबित हो गया है कि भाजपा और निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लूट लिया। पुरानी मतदाता सूचियों को बहाल किया जाना चाहिए और जिन राज्यों में ईवीएम पर कब्जा किए जाने या उन्हें नियंत्रित किए जाने तथा मतदाताओं को उनके अधिकारों का इस्तेमाल करने से रोकने के बाद चुनाव कराए गए, वहां पुरानी मतदाता सूचियों के आधार पर फिर से चुनाव होने चाहिए।’’

उन्होंने कहा, ‘‘जब तक ज्ञानेश कुमार मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहेंगे, तब तक देशभर में विरोध प्रदर्शन होंगे। उन्हें तुरंत गिरफ्तार करके जेल भेजा जाना चाहिए। मुख्य निर्वाचन आयुक्त का पद उनके जैसे व्यक्ति के लिए नहीं है। यह आजादी की एक और लड़ाई है-इस बार उस सीईसी से जिसकी निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं, और उस भाजपा से, जिसने भारत को बर्बाद कर दिया है।’’

उन्होंने कहा कि ‘इंडिया’ गठबंधन के सहयोगियों ने इस मुद्दे पर बात की है और वे जल्द बैठक करेंगे।

तृणमूल कांग्रेस इस साल मई में पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव में हार गई थी, जिससे राज्य में उसका लगातार 15 साल का शासन समाप्त हो गया। पार्टी ने अपनी चुनावी हार के लिए अन्य कारणों के अलावा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को भी जिम्मेदार ठहराया, जिसके तहत लाखों नाम हटाए गए थे और कई लाख अन्य नामों को जांच के अधीन रखा गया था। पार्टी ने इसके लिए “पक्षपातपूर्ण” चुनाव आयोग को भी जिम्मेदार बताया।

उन्होंने दावा किया कि चुनाव से सात-आठ महीने पहले ही उनकी पार्टी ने मतदाताओं के अधिकारों को जबरन छीने जाने को लेकर चिंता जताई थी।

खबर में सामने आई आंतरिक आपत्तियों ने बनर्जी के उस तर्क को और बल दिया, जिसे वह पिछले कई महीनों से उठाती रही हैं। उनका कहना था कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं था, बल्कि पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले मतदाताओं की संरचना बदलने की एक व्यापक कोशिश का हिस्सा था।

उन्होंने दावा किया कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया से शुरुआत में 58 लाख मतदाता प्रभावित हुए, बाद में 27 लाख को बाहर कर दिया गया, जबकि सात लाख अन्य नाम हटा दिए गए। उन्होंने इन सभी को मिलाकर कुल संख्या 92 लाख बताई।

बनर्जी ने यह भी आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया में एआई आधारित प्रणाली का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने निर्वाचन आयोग के आईटी अधिकारियों की भूमिका पर बार-बार सवाल उठाए। उन्होंने विशेष रूप से निर्वाचन आयोग महानिदेशक (आईटी) सीमा खन्ना का नाम लिया। इन आरोपों पर विवाद है और इनकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

इन आंकड़ों का स्तर अब एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। निर्वाचन आयोग ने हाल में उच्चतम न्यायालय को बताया था कि पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से एसआईआर के दौरान 27.16 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए थे, जिनमें से 22 लाख से अधिक ने नाम फिर से शामिल करने के लिए अपील की है। कुल मिलाकर 38.31 लाख अपील दाखिल की गई थीं, जिनमें नाम शामिल करने और हटाने दोनों से संबंधित आवेदन शामिल थे।

इसलिए, एसआईआर से पहले की मतदाता सूची को बहाल करने की बनर्जी की मांग केवल पुनरीक्षण प्रक्रिया को चुनौती देने तक सीमित नहीं है। वह चाहती हैं कि जिस मतदाता सूची के आधार पर विधानसभा चुनाव कराया गया था, उसकी फिर से समीक्षा की जाए।

ईवीएम पर “कब्जा किए जाने या उन्हें नियंत्रित किए जाने” का आरोप लगाते हुए बनर्जी ने दक्षिण 24 परगना जिले के अलीपुर स्थित जिलाधिकारी कार्यालय में कथित आग की घटना का उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि आग उस स्थान पर लगी थी, जहां ईवीएम रखी गई थीं और इस घटना को उन विधानसभा क्षेत्रों से जोड़ा, जहां उनके अनुसार भाजपा को हेरफेर से फायदा हुआ। हालांकि, उन्होंने अपनी टिप्पणी में यह आरोप बिना किसी सबूत के लगाया।

पूर्व मुख्यमंत्री बनर्जी ने कहा कि उप चुनाव आयुक्तों, आईटी अधिकारियों, निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों और अन्य लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए, जिन पर उन्होंने गलत कामों में शामिल होने का आरोप लगाया।

बनर्जी ने निर्वाचन आयोग के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन का आह्वान किया और राजनीतिक दलों, गैर सरकारी संगठनों तथा अन्य लोगों से विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने की अपील की।

उन्होंने पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार पर व्यापक दमन का भी आरोप लगाया और दावा किया कि चार महीनों में 65 से अधिक लोगों की हत्या हुई तथा करीब 14,000 मामले दर्ज किए गए।

बनर्जी ने आरोप लगाया कि पुलिस का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों को याद रखना चाहिए कि “सरकारें बदलती हैं, लेकिन वर्दी बनी रहती है।” उन्होंने इसे महिलाओं और अन्य वर्गों की ओर से न्याय की मांग से जुड़ी शिकायतों से जोड़ा।

बनर्जी की यह टिप्पणी निर्वाचन आयोग द्वारा ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और उसके आरक्षित ‘जोड़ा फूल और घास’ चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगाए जाने के कुछ दिनों बाद आई है। आयोग ने यह कदम पार्टी पर नियंत्रण को लेकर जारी गुटीय विवाद के बीच उठाया था।

इसके बाद निर्वाचन आयोग ने छह अक्टूबर को होने वाले उपचुनावों के लिए दोनों गुटों को अलग-अलग अस्थायी पहचान आवंटित की। ममता गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न दिया गया, जबकि अरूप रॉय के नेतृत्व वाले प्रतिद्वंद्वी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया।

बनर्जी ने इस घटनाक्रम को भी “संस्थागत अतिक्रमण” का एक और उदाहरण बताया और कहा कि आयोग का विरोध करने के बाद उनकी पार्टी का चुनाव चिह्न छीन लिया गया।

उन्होंने पहले की एक संसदीय लड़ाई का भी जिक्र किया और कहा कि ‘इंडिया’ गठबंधन के दलों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के लिए एक नोटिस दिया था, जिसे खारिज कर दिया गया।

उन्होंने कहा, “निर्वाचन आयोग हटाओ, भाजपा हटाओ, मुख्य निर्वाचन आयुक्त हटाओ।” उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी लोकतंत्र और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक और संघर्ष के लिए तैयार है।

भाषा अमित नरेश

नरेश