कांग्रेस प्रत्याधी मिलन प्रधान को नंदीग्राम उपचुनाव लड़ने की अनुमति देनी चाहिए: कलकता उच्च न्यायालय

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कांग्रेस प्रत्याधी मिलन प्रधान को नंदीग्राम उपचुनाव लड़ने की अनुमति देनी चाहिए: कलकता उच्च न्यायालय

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  • Publish Date - September 24, 2026 / 08:22 PM IST,
    Updated On - September 24, 2026 / 08:22 PM IST

(तस्वीरों के साथ)

कोलकाता, 24 सितंबर (भाषा) कलकत्ता उच्च न्यायालय की दो पीठ ने बृहस्पतिवार को अलग-अलग याचिकाओं की सुनवाई करते हुए कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को छह अक्टूबर का नंदीग्राम उपचुनाव लड़ने की अनुमति दिये जाने की राय जाहिर की।

प्रधान की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए, न्यायमूर्ति तीर्थंकर घोष ने यह राय जाहिर की कि उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति दी जानी चाहिए।

यह जमानत याचिका उन चार मामलों के सिलसिले में दायर की गई है, जिनमें प्रधान जेल में बंद हैं।

न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य की पीठ ने भी नंदीग्राम उपचुनाव में प्रधान की उम्मीदवारी के बारे में ऐसी ही राय जाहिर की और मौखिक रूप से कहा कि उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति दी जानी चाहिए।

प्रधान को 18 सितंबर को नंदीग्राम और खेजुरी पुलिस थानों में दर्ज 19 साल पुराने आपराधिक मामलों के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। ये मामले 2007 के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के दौरान हुए हिंसक विरोध-प्रदर्शन से संबंधित हैं।

न्यायमूर्ति तीर्थंकर घोष ने पश्चिम बंगाल सरकार को उन चार मामलों की केस डायरी पेश करने का निर्देश दिया, जिनमें प्रधान ने जमानत का अनुरोध किया है।

सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति घोष ने यह राय जाहिर की कि कांग्रेस उम्मीदवार को चुनाव लड़ने की अनुमति दी जानी चाहिए।

अदालत ने जमानत याचिकाओं पर शुक्रवार को होने वाली अगली सुनवाई के दौरान सरकार से इस मामले में अपना रुख स्पष्ट करने को कहा।

नंदीग्राम में उपचुनाव छह अक्टूबर को होना है और चुनाव प्रचार चार अक्टूबर को समाप्त हो जाएगा।

इससे पहले दिन में, न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने अपनी अदालत में प्रधान की एक और याचिका के सिलसिले में यह भी कहा कि उन्हें नंदीग्राम उपचुनाव लड़ने की अनुमति दी जानी चाहिए।

न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने 22 सितंबर को भी अपने समक्ष मामले की सुनवाई के दौरान यही राय जाहिर की थी।

प्रधान ने जिन चार मामलों में जमानत का अनुरोध किया है, वे 2007 में उनके खिलाफ दर्ज किए गए थे। एक मामले में उन्हें 18 सितंबर को गिरफ़्तार किया गया था। बाद में पुलिस ने उन्हें तीन अन्य मामलों में भी ‘गिरफ़्तार दिखाया’ और हल्दिया एवं कांथी की अदालतों ने उन्हें क्रमशः तीन अक्टूबर और पांच अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

खेजुरी पुलिस थाने में 2007 में दर्ज पांचवें मामले में, न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने उनकी गिरफ्तारी और उसके बाद कांथी अदालत द्वारा उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के आदेश को रद्द कर दिया।

उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि प्रधान को उस मामले में गिरफ़्तार नहीं माना जाएगा, जिसके लिए निचली अदालत ने उन्हें सात अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेजा था।

प्रधान के वकील की दलील पर गौर करते हुए न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि प्रधान को 2007 के उस आपराधिक मामले में पेशी वारंट जारी किया गया था, जिसके तहत उन्हें गिरफ़्तार करके सात अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेजा गया था।

यह मामला उन 11 मामलों से अलग था, जिनका जिक्र 22 सितंबर को उच्च न्यायालय में किया गया था।

न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने संबंधित पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे खेजुरी पुलिस थाने में 2007 के एक मामले के सिलसिले में 12 अक्टूबर तक प्रधान के खिलाफ कोई कार्रवाई न करें, और उस आपराधिक मामले में उन्हें गिरफ्तार नहीं माना जाएगा।

भाषा सुभाष सुरेश

सुरेश