न्यायपालिका पर अध्याय को लेकर विवाद की उम्मीद नहीं थी, सामग्री सही थी: एनसीईआरटी शिक्षाविद् डैनिनो

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न्यायपालिका पर अध्याय को लेकर विवाद की उम्मीद नहीं थी, सामग्री सही थी: एनसीईआरटी शिक्षाविद् डैनिनो

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  • Publish Date - May 28, 2026 / 11:55 AM IST,
    Updated On - May 28, 2026 / 11:55 AM IST

नयी दिल्ली, 28 मई (भाषा) न्यायपालिका पर विवादित अध्याय के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा पहले आजीवन प्रतिबंधित किए गए एनसीईआरटी के तीन शिक्षाविदों में से एक मिशेल डैनिनो ने कहा कि उन्हें ‘‘बिल्कुल उम्मीद नहीं थी’’ कि अब हटाए जा चुके उस अध्याय से इतना बड़ा विवाद खड़ा होगा। साथ ही उन्होंने दावा किया कि इसकी सामग्री ‘‘सही’’ थी और वह इस पर कायम हैं।

पद्मश्री से सम्मानित, फ्रांस में जन्मे भारतीय विद्वान डैनिनो राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के लिए सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों का मसौदा तैयार करने वाले पाठ्यक्रम समूह के अध्यक्ष थे।

मसौदा समिति के दो अन्य सदस्य सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार भी डैनिनो के साथ विवादों में घिर गए थे। यह विवाद आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक के अब हटाए जा चुके अध्याय के एक उपखंड से शुरू हुआ था, जिसमें समाज में न्यायपालिका की भूमिका पर चर्चा की गई थी।

पिछले सप्ताह उच्चतम न्यायालय ने 11 मार्च के अपने आदेश में संशोधन किया था। उस आदेश में न्यायपालिका पर ‘‘आपत्तिजनक’’ सामग्री वाले एनसीईआरटी अध्याय को लेकर इन तीन शिक्षाविदों से दूरी बनाने की बात कही गई थी। संशोधित आदेश में अदालत ने केंद्र, राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, सार्वजनिक विश्वविद्यालयों और सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों को इस मामले में स्वतंत्र निर्णय लेने की छूट दे दी।

डैनिनो ने ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि 11 मार्च के उच्चतम न्यायालय के आदेश का उन पर तत्काल पेशेवर असर पड़ा। इसके चलते भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-गांधीनगर में अतिथि प्रोफेसर के रूप में उनका अनुबंध समाप्त कर दिया गया।

उन्होंने कहा, ‘‘11 मार्च के आदेश के तुरंत बाद वह अनुबंध समाप्त कर दिया गया। मुझसे कोई चर्चा नहीं की गई।’’ उन्होंने आरोप लगाया कि संस्थान ने ‘‘जल्दबाजी में मीडिया के सामने यह घोषित कर दिया कि अब उसका मुझसे कोई संबंध नहीं है।’’

उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले से निपटने के तरीके से तीनों शिक्षाविद् निराश थे।

डैनिनो ने कहा, ‘‘हम निराश थे क्योंकि एनसीईआरटी ने अदालत को पूरी प्रक्रिया नहीं समझाई।’’ उन्होंने कहा कि पाठ्यपुस्तक की सामग्री केवल एनसीईआरटी ने तय नहीं की थी, बल्कि ‘टीचिंग लर्निंग मैटेरियल कमेटी’ और ‘एनसीएफ ओवरसाइट कमेटी’ जैसी उच्च स्तरीय समितियों ने इसे अंतिम रूप दिया था।

उन्होंने कहा, ‘‘यदि हम सक्रिय समिति सदस्य मिलकर उच्चतम न्यायालय के पास जाते और कहते कि हमें संदर्भ समझाने की अनुमति दी जाए कि यह न्यायपालिका के खिलाफ नहीं है, तो मुझे पूरा विश्वास है कि 11 मार्च का आदेश आवश्यक नहीं समझा जाता।’’

उच्चतम न्यायालय द्वारा अध्याय की सामग्री को ‘‘पूरी तरह अवांछनीय’’ बताए जाने पर डैनिनो ने कहा कि संबंधित शिक्षाविदों ने चार अप्रैल को दायर हलफनामों में अदालत के इस आकलन से ‘‘सम्मानपूर्वक असहमति’’ जताई थी।

उन्होंने कहा, ‘‘हम यह स्वीकार नहीं करते कि उसमें कोई मूलभूत आपत्तिजनक बात थी,’’ हालांकि उन्होंने माना कि ‘‘शायद कुछ वाक्यों को अलग ढंग से लिखा जा सकता था।’’

उन्होंने कहा, ‘‘उस विशेष उपखंड का शीर्षक अलग तरीके से लिखा जा सकता था। लेकिन मूल रूप से सामग्री सही थी। हम इस पर कायम हैं।’’

डैनिनो ने कहा कि अध्याय केवल ‘‘प्रामाणिक स्रोतों’’ पर आधारित था और इसे किसी “अपमानजनक उद्देश्य” से नहीं लिखा गया था।

पिछले पाठ्यपुस्तक विवादों को याद करते हुए डैनिनो ने कहा कि सामाजिक विज्ञान की सामग्री को लेकर विवाद कोई नयी बात नहीं है और यह 1970 के दशक से विभिन्न सरकारों के दौरान सामने आते रहे हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘मैं 1990 के दशक से भारत की पाठ्यपुस्तकों का अध्ययन कर रहा हूं। मेरे पास बहुत सारे दस्तावेज हैं। मैं भरोसे के साथ कह सकता हूं कि सामाजिक विज्ञान को लेकर विवाद भारत में 1970 के दशक में शुरू हुए थे।’’

डैनिनो ने कहा कि मोरारजी देसाई की सरकार के दौरान प्रकाशित पाठ्यपुस्तकों को लेकर भी काफी विवाद हुए थे और समय के साथ सरकारों तथा पाठ्यपुस्तकों के बदलने के बावजूद ऐसी बहसें जारी रहीं।

डैनिनो ने दावा किया कि अब हटाया गया अध्याय छात्रों में आलोचनात्मक सोच विकसित करने और ‘‘वास्तविक जीवन की चुनौतियों’’ पर चर्चा करने के उद्देश्य से तैयार किया गया था।

उन्होंने कहा कि यह अध्याय राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (एनईपी 2020) और स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा 2023 (एनसीएफ-एसई 2023) के अनुरूप तैयार किया गया था।

डैनिनो ने कहा कि यह अध्याय न्यायपालिका को निशाना नहीं बनाता था और संसद सहित अन्य संस्थानों से जुड़े समान मुद्दों पर भी पुस्तक में चर्चा की गई थी।

उन्होंने कहा, ‘‘जब तक हम संस्थागत कमियों को नहीं पहचानेंगे, तब तक हम उनका समाधान कभी नहीं कर पाएंगे।’’

भाषा गोला मनीषा

मनीषा