न्यायालय अब मानव-केंद्रित से पारिस्थितिकी-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर बढ़ रहा है: न्यायमूर्ति नागरत्ना

न्यायालय अब मानव-केंद्रित से पारिस्थितिकी-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर बढ़ रहा है: न्यायमूर्ति नागरत्ना

न्यायालय अब मानव-केंद्रित से पारिस्थितिकी-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर बढ़ रहा है: न्यायमूर्ति नागरत्ना
Modified Date: September 20, 2026 / 08:04 pm IST
Published Date: September 20, 2026 8:04 pm IST

नयी दिल्ली, 20 सितंबर (भाषा) पर्यावरण संबंधी न्यायशास्त्र में उच्चतम न्यायालय के योगदान को ‘‘अत्यंत व्यापक और महत्वपूर्ण’’ बताते हुए न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने रविवार को कहा कि शीर्ष अदालत अब पर्यावरण के मामलों में मानव-केंद्रित दृष्टिकोण से पारिस्थितिकी-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर बदलाव को बढ़ावा दे रही है।

उन्होंने कहा, ‘‘पर्यावरण से जुड़े मामलों में फ़ैसला करना भविष्य को ध्यान में रखकर किया जाने वाला काम है, जिसमें अदालतों को भविष्य के प्रति सजग रहते हुए वर्तमान के मामलों को देखना होता है।’’

न्यायमूर्ति नागरत्ना विज्ञान भवन में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) द्वारा आयोजित ‘पर्यावरण और जलवायु गतिशीलता का भविष्य’ विषय पर दो-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित कर रही थीं।

उन्होंने कहा कि पर्यावरण कानून को प्रकृति को संपत्ति, वस्तु या संसाधन मानने की सोच से आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपराओं ने लंबे समय से मनुष्य को प्राकृतिक व्यवस्था का हिस्सा माना है, न कि उससे ऊपर।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘‘पर्यावरण संबंधी न्यायशास्त्र में उच्चतम न्यायालय का योगदान अत्यंत व्यापक और महत्वपूर्ण रहा है। वास्तव में, पर्यावरण के मामलों में उच्चतम न्यायालय अब मानव-केंद्रित दृष्टिकोण से पारिस्थितिकी-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर बदलाव को बढ़ावा दे रहा है।’’

उन्होंने कहा कि मानव-केंद्रित दृष्टिकोण में मनुष्य को ब्रह्मांड का केंद्रीय या सबसे महत्वपूर्ण तत्व माना जाता है, जबकि पारिस्थितिकी-केंद्रित दृष्टिकोण में नैतिक विचार के केंद्र में केवल मनुष्य नहीं, बल्कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र को रखा जाता है।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि इसका अर्थ यह स्वीकार करना है कि केवल मानव होने के आधार पर मानव हितों को गैर-मानवीय दुनिया के हितों पर स्वत: प्राथमिकता नहीं मिल जाती। उन्होंने कहा कि इसके बजाय, मनुष्यों का दायित्व है कि वे अन्य जीवों के प्रति जिम्मेदारी निभाएं।

उन्होंने कहा, ‘‘हाल के वर्षों में उच्चतम न्यायालय सहित कई न्यायालयों ने पर्यावरणीय न्याय की अवधारणा को ठोस रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।’’

भाषा शफीक सुरेश

सुरेश


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