पदोन्नति संबंधी पारिवारिक न्यायालय के न्यायाधीशों की याचिका पर सुनवाई से न्यायालय का इनकार

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पदोन्नति संबंधी पारिवारिक न्यायालय के न्यायाधीशों की याचिका पर सुनवाई से न्यायालय का इनकार

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  • Publish Date - August 31, 2026 / 02:50 PM IST,
    Updated On - August 31, 2026 / 02:50 PM IST

(फाइल फोटो के साथ)

नयी दिल्ली, 31 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने महाराष्ट्र के सात पारिवारिक न्यायालयों के न्यायाधीशों की उस याचिका पर सुनवाई करने से सोमवार को इनकार कर दिया जिसमें उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त किए जाने के लिए उनके नामों पर विचार करने का निर्देश दिए जाने का अनुरोध किया था।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि पारिवारिक न्यायालयों के न्यायाधीश होने के नाते वे भारत के क्षेत्र में ‘न्यायिक पद’ पर हैं और न्यायिक कार्यों का निर्वहन करते हैं इसलिए उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त किए जाने के लिए उनके नामों पर विचार किया जाना चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि ‘‘समस्या पारिवारिक न्यायालयों के लिए अलग काडर बनाए जाने में है’’ और उसने सवाल किया कि तथ्यों या कानूनी स्थिति में कोई बदलाव नहीं होने पर पहले के फैसलों पर फिर से कैसे विचार किया जा सकता है।

पीठ ने कहा, ‘‘याचिकाकर्ताओं के पास संभवत: यही विकल्प है कि वे संबंधित उच्च न्यायालय और राज्य सरकार से पारिवारिक न्यायालयों के पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति के नियमों को खासकर अन्य राज्यों में ऐसी नियुक्तियों के लिए लागू प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से तैयार करने का अनुरोध करें।’’

पीठ ने कहा, ‘‘हम यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि यह मूल रूप से नीतिगत मामला है और संबंधित उच्च न्यायालय एवं राज्य सरकार आपस में परामर्श करके इस संबंध में उचित कदम उठा सकते हैं।’’

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आर. बसंत ने कहा कि याचिका में संविधान के अनुच्छेद 217 की व्याख्या से जुड़ा सवाल शामिल है।

संविधान के अनुच्छेद 217 में उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति, योग्यता, कार्यकाल और सेवा शर्तों का प्रावधान है।

बसंत ने कहा कि याचिकाकर्ता उच्च न्यायालय नहीं जा सकते क्योंकि उच्चतम न्यायालय का पहले से एक फैसला है, जिसके कारण उन्हें कोई राहत नहीं मिल सकती।

उच्चतम न्यायालय ने पहले कहा था कि पारिवारिक न्यायालयों के न्यायाधीश व्यापक अर्थ में न्यायालयों की अध्यक्षता करने वाले ‘न्यायाधीश’ हो सकते हैं, लेकिन वे न तो राज्य की ‘न्यायिक सेवा’ के सदस्य या उसका अभिन्न हिस्सा हैं और न ही अनुच्छेद 217 के तहत परिकल्पित ‘न्यायिक पद’ पर हैं इसलिए उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त किए जाने के लिए उनके नामों पर विचार किए जाने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है।

भाषा

सिम्मी नरेश

नरेश