नयी दिल्ली, 22 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने धार्मिक आयोजनों, राजनीतिक रैलियों और यात्राओं समेत बड़े सार्वजनिक समारोहों के दौरान भगदड़ रोकने से जुड़ी जनहित याचिका पर कोई व्यापक आदेश पारित करने से बृहस्पतिवार को इनकार कर दिया।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची एवं न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने याचिकाकर्ता को यह मामला केंद्रीय गृह मंत्रालय और निर्वाचन आयोग के समक्ष आगे बढ़ाने की अनुमति दी।
प्रधान न्यायाधीश ने सुनवाई की शुरुआत में भीड़ प्रबंधन एवं कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे को लेकर बुनियादी सवाल उठाए।
पीठ ने कहा कि तुम्बलम गूटी वेंकटेश द्वारा दायर याचिका में केंद्र को बड़ी संख्या में लोगों के जमावड़े वाले सार्वजनिक आयोजनों के दौरान भीड़ प्रबंधन एवं सुरक्षा के संबंध में बाध्यकारी मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करने और लागू करने का निर्देश दिए जाने का अनुरोध किया गया है।
उसने कहा, ‘‘आचार संहिता लागू रहने के दौरान देशभर में होने वाली राजनीतिक रैलियों में एसओपी को लागू करने के लिए भी इसी तरह के निर्देश जारी किए जाने का अनुरोध किया गया है। याचिकाकर्ता ने राष्ट्रीय भीड़ प्रबंधन सुरक्षा संहिता तैयार किए जाने का भी अनुरोध किया है।’’
पीठ ने कहा, ‘‘याचिकाकर्ता ने 18 दिसंबर, 2025 को दिए गए अभ्यावेदन में ये मुद्दे उठाए थे।’’
उसने कहा कि यह मुद्दा सार्वजनिक आयोजनों और सभाओं में कानून-व्यवस्था बनाए रखने को लेकर राज्यों और केंद्र की जिम्मेदारी के इर्द-गिर्द घूमता है।
पीठ ने कहा, ‘‘अतः नीति निर्माण के लिए दिशा-निर्देश जारी किए जाने का अनुरोध किया जा रहा है जिसके लिए कानून एवं व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों के विशेषज्ञ अधिक उपयुक्त हैं। चूंकि याचिकाकर्ता पहले ही गृह मंत्रालय से संपर्क कर चुका है, इसलिए हम इस स्तर पर याचिका का निपटारा करना उचित समझते हैं ताकि याचिकाकर्ता भारत संघ के समक्ष अपने अभ्यावेदन को आगे बढ़ा सके और वह इस अभ्यावेदन की एक प्रति निर्वाचन आयोग को भी दे सकता है… हम यह सक्षम प्राधिकारी पर छोड़ते हैं कि यदि वे उचित समझें तो वे अभ्यावेदन पर विचार करें।
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा, ‘‘क्या हम ऐसे निर्देश दे सकते हैं?’’
उसने भीड़ नियंत्रण के लिए न्यायालय द्वारा अनिवार्य एवं व्यापक दिशानिर्देशों की व्यवहार्यता को लेकर आशंका व्यक्त की।
याचिकाकर्ता के वकील ने इस सवाल के जवाब में कहा कि न्यायालय ने पहले भी नीति संबंधी ऐसे मामलों में हस्तक्षेप किया है जिनमें कमजोर लोगों का जीवन खतरे में था।
उन्होंने बेघर मानसिक रूप से निशक्त व्यक्तियों से जुड़ी एक पूर्व जनहित याचिका का हवाला दिया जिसमें अदालत ने एसओपी बनाने का निर्देश दिया था।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘मान लीजिए कि कुछ लोग अपने मौलिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए दिल्ली में धरना देना चाहते हैं। हम इसे इस तरह विनियमित कर सकते हैं कि किसी को परेशानी न हो और साथ ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे लेकिन अगर कहा जाए कि चेन्नई में कोई रैली होनी है, मैदान में 10,000 लोग आ सकते हैं लेकिन 50,000 पहुंच जाएं, तो फिर हम क्या करें?’’
पीठ ने कहा कि अभ्यावेदन 18 दिसंबर को दिया गया था और शीर्ष अदालत में दाखिल करने के लिए याचिका 21 दिसंबर को तैयार हुई।
प्रधान न्यायाधीश ने जनहित याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि अधिकारियों को ‘‘सांस लेने का कुछ समय’’ दिया जाना चाहिए।
भाषा सिम्मी मनीषा
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