नयी दिल्ली, 19 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को अपने समक्ष लंबित मामले की फाइल से कार्यवाही का अभिलेख गायब पाए जाने का संज्ञान लिया और अपने महासचिव को इस मामले की तथ्यान्वेषी जांच करने का निर्देश दिया।
गोवा में प्रस्तावित बाघ अभयारण्य से संबंधित एक मामले की सुनवाई करते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने पाया कि इस मामले में उनका आठ सितंबर, 2025 का आदेश फाइल से गायब था।
पीठ ने टिप्पणी की कि अब पत्रावलियों (पेपर बुक) से कार्यवाही का रिकॉर्ड गायब होना एक सामान्य बात बनती जा रही है।
न्यायालय ने कहा, ‘‘खास मकसद से यह जानबूझकर किया गया प्रयास प्रतीत होता है।’’
उसने कहा, ‘‘महासचिव को एक तथ्यान्वेषी जांच करने और प्रशासनिक पक्ष पर भारत के प्रधान न्यायाधीश को एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया जाता है।’’
शीर्ष अदालत मुंबई उच्च न्यायालय की गोवा पीठ के जुलाई 2023 के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें राज्य को तीन महीने के भीतर म्हादेई वन्यजीव अभयारण्य और उसके आसपास के क्षेत्रों को बाघ अभयारण्य के रूप में अधिसूचित करने के लिए कहा गया था।
पीठ ने बृहस्पतिवार को सुनवाई के दौरान गौर किया कि सर्वोच्च न्यायालय ने आठ सितंबर, 2025 को कहा था कि यह उचित होगा कि यदि एक केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) इस मुद्दे की जांच करे और उसके समक्ष एक रिपोर्ट प्रस्तुत करे।
शीर्ष अदालत ने सीईसी को इस मुद्दे की जांच करने और छह सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश देते हुए कहा था कि समिति राज्य सरकार और उच्च न्यायालय के समक्ष याचिकाकर्ता सहित सभी हितधारकों को सुनवाई का अवसर देगी।
पीठ ने बृहस्पतिवार को गौर किया कि सीईसी ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है।
पीठ ने प्रतिवादियों को अपना पक्ष रखने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। प्रतिवादियों में गैर-सरकारी संगठन गोवा फाउंडेशन भी शामिल है।
म्हादेई वन्यजीव अभयारण्य गोवा के उत्तरपूर्वी भाग में 208 वर्ग किलोमीटर में फैला है और कर्नाटक से सटा हुआ है।
भाषा प्रशांत सुरेश
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