नयी दिल्ली, तीन अप्रैल (भाषा) अखिल भारतीय संत समिति ने उच्चतम न्यायालय से कहा है कि अदालतों को आवश्यक धार्मिक प्रथाओं का निर्धारण नहीं करना चाहिए क्योंकि ये लोगों की आस्था से जुड़ी होती हैं और उनके लिए पवित्र होती हैं।
समिति ने शबरिमला पुनर्विचार याचिका की आगामी सुनवाई में हस्तक्षेप करने का अनुरोध करते हुए उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह बात कही।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-सदस्यीय पीठ केरल के शबरिमला मंदिर समेत धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से संबंधित याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई सात अप्रैल से शुरू करेगी।
सितंबर 2018 में, पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए उस प्रतिबंध को हटा दिया था, जो 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को केरल के शबरिमला स्थित अय्यप्पा मंदिर में प्रवेश करने से रोकता था।
शीर्ष अदालत ने कहा था कि सदियों पुरानी यह हिंदू धार्मिक प्रथा अवैध और असंवैधानिक है।
अखिल भारतीय संत समिति ने वकील अतुलेश कुमार के माध्यम से दायर अपनी अर्जी में शबरिमला पुनर्विचार याचिका की सुनवाई में हस्तक्षेप करने के लिए अदालत की अनुमति मांगी है।
याचिका में कहा गया है कि न्यायपालिका को धार्मिक प्रथाओं में तभी हस्तक्षेप करना चाहिए जब वे सीधे तौर पर सार्वजनिक व्यवस्था का उल्लंघन करती हों या नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर ऐसा करना आवश्यक हो।
इसमें कहा गया है कि समानता के मौलिक अधिकार (संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत प्रदत्त) का इस्तेमाल धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने और उसका पालन करने के अधिकार (अनुच्छेद 25) को दरकिनार करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
शबरिमला मंदिर में लगाए गए प्रतिबंधों को उचित ठहराते हुए याचिका में कहा गया है कि कुछ मंदिर अनुष्ठानों और विशिष्ट परंपराओं का पालन करते हैं।
याचिका में दलील दी गई है कि इस धार्मिक प्रथा को अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित किया जाना चाहिए और इसे महिलाओं पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं कहा जा सकता है क्योंकि यह एक विशेष आयु वर्ग को प्रतिबंधित करती है और इसलिए, यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करती है।
भाषा
देवेंद्र वैभव
वैभव