मासिक धर्म स्वास्थ्य पर बातचीत का माहौल बनाना समाज की साझा जिम्मेदारी : विशेषज्ञ

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मासिक धर्म स्वास्थ्य पर बातचीत का माहौल बनाना समाज की साझा जिम्मेदारी : विशेषज्ञ

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  • Publish Date - May 28, 2026 / 09:16 PM IST,
    Updated On - May 28, 2026 / 09:16 PM IST

भुवनेश्वर, 28 मई (भाषा) ओडिशा राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष बबीता पात्रा ने बृहस्पतिवार को कहा कि मासिक धर्म जीवन का एक हिस्सा है और समाज को ऐसा माहौल बनाना चाहिए, जहां लड़कियां और महिलाएं गरिमा और आत्मविश्वास के साथ मासिक धर्म स्वास्थ्य के बारे में खुलकर बात कर सकें।

भुवनेश्वर में आयोजित मासिक धर्म स्वास्थ्य एवं स्वच्छता सम्मेलन-2026 को संबोधित करते हुए पात्रा ने इस बात पर जोर दिया कि मासिक धर्म के कारण किसी भी लड़की या महिला को बहिष्कृत, शर्मिंदा या असुरक्षित महसूस नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा, “एक दयालु और जागरूक समाज सभी के लिए मासिक धर्म संबंधी गरिमा की नींव है।”

मासिक धर्म स्वच्छता दिवस 2026 के उपलक्ष्य में आईना के नेतृत्व में यूनिसेफ के सहयोग से ओडिशा मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता गठबंधन (ओएमएचएच एलायंस) ने ‘एक साथ आगे बढ़ना : मासिक धर्म स्वास्थ्य को एक मौलिक अधिकार के रूप में बदलना” विषय पर राज्य स्तरीय बहु-हितधारक संवाद का आयोजन किया।

सम्मेलन में ओडिशा की अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक शाइनी एस ने कहा कि देशभर में लड़कियों और महिलाओं को साफ पानी, स्वच्छ शौचालय और सैनिटरी पैड की उपलब्धता सुनिश्चित करने में अभी भी बड़ी चुनौतियां हैं – फिर चाहे वह स्कूल, कॉलेज और कार्यस्थल पर हो या फिर ​​कि सड़कों के किनारे और सार्वजनिक स्थानों पर।

उन्होंने कहा, “ये विलासिता के साधन नहीं, बल्कि बुनियादी जरूरतें हैं, जिनकी गारंटी दी जानी चाहिए, ताकि हर महिला और लड़की सुरक्षा, आराम और गरिमा के साथ अपने मासिक धर्म चक्र का प्रबंधन कर सके।”

शाइनी ने कई समुदायों में लड़कियों के पहले मासिक धर्म का उत्सव मनाने की परंपरा पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इस तरह की प्रथाएं अक्सर बहिष्कारवादी और भेदभावपूर्ण सामाजिक रीति-रिवाजों से जुड़ी होती हैं।

शाइनी ने कहा कि गरिमा, स्वतंत्रता और सम्मान के बिना उत्सव मनाने का कोई खास मतलब नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं को खुद एक-दूसरे का समर्थन करना चाहिए, क्योंकि वे इन अनुभवों को बेहतर ढंग से समझ सकती हैं।

शाइनी ने मासिक धर्म से संबंधित बातचीत में लड़कों और पुरुषों को शामिल करने का भी आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सभी लिंगों के बीच सहानुभूति और जागरूकता शर्मिंदगी को दूर करने और अधिक समान एवं गरिमापूर्ण समाज के निर्माण के लिए आवश्यक है।

यूनिसेफ ओडिशा के मुख्य फील्ड अधिकारी प्रशांत कुमार डैश ने कहा कि स्वच्छता उत्पादों की उपलब्धता बढ़ने के बावजूद देश के कई हिस्सों में मासिक धर्म से जुड़े सामाजिक वर्जनाएं और पाबंदियां अभी भी कायम हैं। उन्होंने कहा कि समाज में मासिक धर्म को सामान्य बनाने की शुरुआत घरों, स्कूल, कार्यस्थलों और समुदायों में खुलकर बातचीत से होनी चाहिए।

डैश ने कहा, “ओडिशा की खुशी योजना और इसी तरह की अन्य पहल मासिक धर्म स्वच्छता में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं, लेकिन सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ने के लिए सामूहिक सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता है।”

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) भुवनेश्वर के निदेशक प्रोफेसर श्रीपद कर्मलकर ने कहा कि मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य और स्वच्छता को मौलिक अधिकार में बदलना गरिमा, समानता एवं मानव कल्याण पर आधारित एक सामूहिक जिम्मेदारी है।

उन्होंने कहा, “स्वास्थ्य, स्वच्छता, गरिमा और कल्याण का अधिकार हर व्यक्ति को है। मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य अनुच्छेद-21 के तहत जीवन, गरिमा और गोपनीयता के संवैधानिक अधिकारों का अभिन्न अंग है।”

भाषा पारुल माधव

माधव