नयी दिल्ली, 11 फरवरी (भाषा) राज्यसभा में द्रमुक के सदस्य पी. विल्सन ने बुधवार को सरकार से राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को संवैधानिक दर्जा देने तथा उसके जांच और प्रवर्तन अधिकारों को मजबूत करने की मांग की, ताकि अल्पसंख्यक समुदायों के हितों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाते हुए विल्सन ने कहा कि हाल के वर्षों में देश में अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ लक्षित हिंसा की घटनाओं में चिंताजनक वृद्धि हुई है। उन्होंने भीड़ द्वारा पीट पीट कर जान लेने की घटनाओं, पादरियों और धर्मगुरुओं पर हमले तथा चर्च और मस्जिदों में तोड़फोड़ की घटनाओं का उल्लेख करते हुए अपने तर्क के समर्थन में आंकड़ों का हवाला दिया।
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानूनों का दुरुपयोग कर एक ही मामले में कई प्राथमिकी दर्ज की जा रही हैं, यहां तक कि नाबालिगों के खिलाफ भी। उनके अनुसार, लोगों को महीनों तक जेल में रखा जाता है और बाद में बरी कर दिया जाता है। उनके मुताबिक, 2020 से अब तक धर्मांतरण विरोधी कानूनों के तहत करीब 400 मामले दर्ज हुए हैं, जिनमें लगभग 1,200 लोगों को गिरफ्तार किया गया।
विल्सन ने कहा कि ऐसे कदम संविधान में निहित समानता, धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता के वादे के विपरीत हैं। उन्होंने कहा कि जिस समय अल्पसंख्यकों को संस्थागत संरक्षण की सबसे अधिक जरूरत है, उसी समय राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग “एक खाली दफ्तर” बनकर रह गया है।
उन्होंने कहा कि आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सभी सदस्यों के पद रिक्त हैं। कुछ पद पिछले 10 महीनों से खाली हैं, जबकि कुछ तीन वर्षों से अधिक समय से रिक्त पड़े हैं।
द्रमुक सदस्य ने कहा कि 2017-18 में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने आयोग को भेदभाव और हिंसा के मामलों में अप्रभावी बताया था और उसे तत्काल संवैधानिक दर्जा देने की सिफारिश की थी। वर्तमान में आयोग के पास केवल परामर्शात्मक अधिकार हैं। उन्होंने एक पूर्व अध्यक्ष के हवाले से कहा कि आयोग को “दंतहीन बाघ” कहा गया था क्योंकि उसके पास केवल सिफारिश करने की शक्ति है।
विल्सन ने सरकार से आयोग में रिक्त पदों को तत्काल भरने की अपील की। साथ ही उन्होंने भारत के संविधान और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 में संशोधन कर आयोग को संवैधानिक दर्जा देने की मांग की।
उन्होंने यह भी आग्रह किया कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार को अपराध के रूप में परिभाषित किया जाए और आयोग को मामलों के पंजीकरण के निर्देश देने तथा जांच और प्रवर्तन संबंधी सशक्त अधिकार प्रदान किए जाएं।
भाषा मनीषा माधव
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