निर्वाचन आयोग स्वतंत्र होना चाहिए, निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है: न्यायालय

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निर्वाचन आयोग स्वतंत्र होना चाहिए, निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है: न्यायालय

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  • Publish Date - May 14, 2026 / 09:43 PM IST,
    Updated On - May 14, 2026 / 09:43 PM IST

नयी दिल्ली, 14 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं, और यह तभी सुनिश्चित किया जा सकता है, जब निर्वाचन आयोग स्वतंत्र हो और स्वतंत्र प्रतीत भी हो।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) और निर्वाचन आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति को नियंत्रित करने वाले एक नए कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली छह याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई के दौरान ये टिप्पणियां कीं।

दो जनवरी, 2024 को लागू हुआ मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 यह अनिवार्य करता है कि सीईसी और ईसी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता वाली एक चयन समिति की सिफारिश पर की जाएगी।

इस कानून के तहत तीन सदस्यीय चयन समिति में भारत के प्रधान न्यायाधीश की जगह केंद्रीय मंत्रिमंडल के मंत्री को शामिल किया गया है।

केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी की दलीलें सुनते हुए न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा, ‘‘निर्वाचन आयोग का स्वतंत्र होना ही पर्याप्त नहीं है; उसे स्वतंत्र दिखना भी चाहिए।’’

अटॉर्नी जनरल ने दलील पेश करते हुए कहा कि संसद को कानून बनाने का पूर्ण अधिकार है और वह अनूप बर्णवाल मामले में पांच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा सुझाए गए ‘‘अस्थायी’’ उपाय का पालन करने के लिए बाध्य नहीं है।

उन्होंने कहा कि बर्णवाल फैसला अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय करने की विवेकाधीन शक्ति) का प्रयोग था और अनुच्छेद 141 के तहत बाध्यकारी कानून नहीं था जो संसद के किसी अधिनियम को रद्द कर सके।

केंद्र के वकील ने कहा कि पीठ को काल्पनिक पूर्वाग्रह के आधार पर किसी कानून को रद्द नहीं करना चाहिए।

न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा कि निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता संविधान की ‘‘बुनियादी संरचना’’ का एक पहलू है, क्योंकि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव इसी पर निर्भर करते हैं।

पीठ ने पूछा, ‘‘विश्वास का स्तर इतना होना चाहिए कि ऐसा प्रतीत हो जैसे चयन समिति में कोई तीसरा निष्पक्ष व्यक्ति भी शामिल था। वह व्यक्ति मंत्रिमंडल का मंत्री ही क्यों होना चाहिए?’’

न्यायिक हस्तक्षेप के संबंध में अटॉर्नी जनरल की दलीलों का जिक्र करते हुए, न्यायमूर्ति दत्ता ने राज्य के अंगों के बीच आपसी सम्मान पर जोर दिया।

उन्होंने कहा, ‘‘संसद न्यायपालिका पर चाहे जो आरोप लगाए, लेकिन हम अपनी लक्ष्मण रेखा जानते हैं। हम ऐसा कभी नहीं करेंगे।’’

अटॉर्नी जनरल ने कहा, ‘‘याचिकाकर्ताओं की पहला अनुरोध कानून की वैधता के खिलाफ है। यदि वह विफल हो जाता है, तो कोई अन्य प्रार्थना शेष नहीं रह जाती।’’

उन्होंने कहा, ‘‘निर्वाचन आयोग स्वतंत्र है या नहीं, इस प्रश्न का उत्तर अमूर्त रूप से नहीं दिया जा सकता। यह तथ्य और साक्ष्य का प्रश्न है। यदि न्यायालय यह तय करता है कि निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति का सर्वोत्तम तरीका क्या है, तो न्यायालय विधायी क्षेत्र में हस्तक्षेप करता है।’’

प्रारंभ में, याचिकाकर्ता गैर सरकारी संगठन ‘लोक प्रहरी’ के पदाधिकारी के रूप में उपस्थित पूर्व आईएएस अधिकारी एस एन शुक्ला ने दलील दी कि नया अधिनियम ‘‘संविधान के साथ धोखा’’ है।

शुक्ला ने कहा कि अधिनियम ने जानबूझकर अनूप बर्णवाल मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा सुझाए गए सुरक्षा उपायों को दरकिनार कर दिया है।

भाषा शफीक माधव

माधव