नयी दिल्ली, 27 मई (भाषा) निर्वाचन आयोग के पर्यवेक्षी अधिकार को ‘‘स्वाभाविक रूप से व्यापक’’ बताते हुए, बुधवार को उच्चतम न्यायालय ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) संबंधी उसके अधिकार को बरकरार रखा और कहा कि संविधान के तहत उसकी शक्तियों में महज इसलिए कटौती नहीं की जा सकती कि संसद ने चुनावों पर एक कानून बनाया है।
संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग की शक्तियों से संबंधित है। इसके अनुसार, ‘‘संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनाव तथा संविधान के तहत राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनावों के लिए मतदाता सूची तैयार करने और उनके संचालन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण एक आयोग (जिसे इस संविधान में निर्वाचन आयोग कहा गया है) में निहित होगा।’’
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मतदाता सूचियों की एसआईआर संबंधी निर्वाचन आयोग की शक्ति को बरकरार रखा तथा संवैधानिक योजना और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपीए) के प्रावधानों पर विस्तार से चर्चा की।
प्रधान न्यायाधीश ने 124 पृष्ठ के फैसले में, इसका सकारात्मक उत्तर दिया कि क्या निर्वाचन आयोग को विवादित एसआईआर की कवायद करने का अधिकार है।
पीठ ने फैसला सुनाया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने का निर्वाचन आयोग का संवैधानिक दायित्व व्यापक है और इसे संसदीय कानून द्वारा समाप्त या निष्क्रिय नहीं किया जा सकता है।
न्यायालय ने कहा, ‘‘हमारा मानना है कि विवादित एसआईआर न तो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और 1960 के नियमों के सीधे विरोध में है, और न ही यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की संवैधानिक अनिवार्यता को कम करता है। बल्कि, यह संविधान के अनुच्छेद 324 के साथ पढ़े जाने पर उक्त अधिनियम की धारा 21(3) के अंतर्गत की जाने वाली कवायद है, जिसे संविधान के भाग 15 के उद्देश्य की रक्षा के लिए बनाया गया है।’’
भाषा सुभाष पवनेश
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